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स॒प्त वी॒रासो॑ अध॒रादुदा॑यन्न॒ष्टोत्त॒रात्ता॒त्सम॑जग्मिर॒न्ते । नव॑ प॒श्चाता॑त्स्थिवि॒मन्त॑ आय॒न्दश॒ प्राक्सानु॒ वि ति॑र॒न्त्यश्न॑: ॥

English Transliteration

sapta vīrāso adharād ud āyann aṣṭottarāttāt sam ajagmiran te | nava paścātāt sthivimanta āyan daśa prāk sānu vi tiranty aśnaḥ ||

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Pad Path

स॒प्त । वी॒रासः॑ । अ॒ध॒रात् । उत् । आ॒य॒न् । अ॒ष्ट । उ॒त्त॒रात्ता॑त् । सम् । अ॒ज॒ग्मि॒र॒न् । ते । नव॑ । प॒श्चाता॑त् । स्थि॒वि॒ऽमन्तः॑ । आ॒य॒न् । दश॑ । प्राक् । सानु॑ । वि । ति॒र॒न्ति॒ । अश्नः॑ ॥ १०.२७.१५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:27» Mantra:15 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:17» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:15


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सप्त वीरासः-अधरात्-उदायन्) विराड्रूप परमात्मा के रचित गतिमान् पृथिव्यादि लोक स्थूलरूप में प्रकट हुए हैं (उत्तरात्तात् ते अष्ट समजग्मिरन्) सूक्ष्मरूप में वे आठ वसु-वसानेवाले देव वायु आदि सर्वत्र वहनेवाले उत्पन्न हुए (पश्चातात्-नव स्थिविमन्तः-आयन्) पश्चात् नौ ग्रह चन्द्र  आदि आधार को अपेक्षित करनेवाले प्रकटीभाव को प्राप्त हुए (दश-अश्नः प्राक् सानु वितिरन्ति) दश व्याप्त पूर्व से पूर्वादि दिशाएँ स्थानमात्र को विकसित करती हैं-आश्रय देती हैं ॥१५॥
Connotation: - परमात्मा ने घूमनेवाले पृथिवी आदि लोकों को, वायु आदि सूक्ष्म वसुओं को, चन्द्र आदि आश्रय पानेवाले ग्रहों और दूसरों को आश्रय देनेवाली दिशाओं को उत्पन्न कर धारा हुआ है ॥१५॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दशम दशक्त से पूर्व ही

Word-Meaning: - [१] (सप्त) = सात (वीरासः) = [वि + ईर] विशिष्टरूप से शत्रुओं को कम्पित करनेवाले मरुत् अर्थात् प्राणा (अधरात्) = नीचे से लेकर (उत् आयन्) = ऊपर तक आते हैं, ये प्राण, प्राणायाम के द्वारा सिद्धि के होने पर शरीर को नीरोग बनाते हैं, जरा ऊपर आकर मन को निर्मल करते हैं, कुछ और ऊपर उठकर ये बुद्धि को बड़ा तीव्र बना देते हैं। इस प्रकार ये प्राण मनुष्य को भी ऊपर उठानेवाले होते हैं। इस प्राण साधना के द्वारा योगदर्शन के शब्दों में 'ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्' प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। 'धारणासु च योग्यता मनसः' मन की धारणाओं में योग्यता उत्पन्न होती है, मन को देश- विशेष में बाँधना सुगम हो जाता है। [२] इस प्राण साधना को ही परिणाम होता है कि (ते अष्ट) = शरीर में मेरुदण्ड के मूल से शिखर तक रहनेवाले वे आठ चक्र (उत्तरातात्) = ऊपर (समजग्मिरन्) = संगत होते हैं। मेरुदण्ड के मूल में मूलाधार चक्र है, शिखर पर सहस्रार चक्र । मूलाधार चक्र में ही कुण्डलिनी शक्ति का निवास है । यह प्राणों की उष्णता से कुण्डल को तोड़कर ऊपर उठती है और सुषुमणा नाड़ी में से होती हुई मेरुपर्वत के शिखर पर स्थित सहस्रार चक्र के स्थान तक पहुँचती है । [३] (नव) = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ और वाणी व जिह्वा के दोनों ओर होने से ये नौ की नौ इन्द्रियाँ, विषयों से व्यावृत्त होकर (स्थिविमन्तः) = 'स्थानमन्तः ' विषयों में न भटकने से स्थित हुई हुई (पश्चात्तात्) = पीछे (आयन्) = आ जाती हैं, यही इन्द्रियों का 'प्रत्याहार' कहलाता है । [४] इस प्रकार प्रत्याहार की साधना करके (दश-प्राक्) = दसवें दशक से पूर्व ही [दशभ्यः प्राक् ], अर्थात् मरण से पूर्व ही 'प्राक् शरीर विमोक्षणात्' (अश्नः) = [अशनवतः] बड़ा खानेवाले, अर्थात् न रजनेवाले इस काम के (सानु) = शिखर को (वितिरन्ति) = नष्ट कर डालते हैं। शरीर मोक्ष से पूर्व ही काम के वेग को जीतना आवश्यक है। यदि हम इसे नहीं जीतते तो यह हमारा नाश कर देता है। इसका नाश हमारे जीवन का कारण बनता है। काम के सिर को कुचल देना ही, इसे दवा देना ही, वश में कर लेना ही इसके शिखर का नाश है।
Connotation: - भावार्थ- सप्त प्राण, अष्ट चक्र व नव द्वार हमारे स्वस्थ व स्वाधीन हों और हम मृत्यु से ही पूर्व ही काम-क्रोधोद्भव वेग को जीतनेवाले हों ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सप्त वीरासः-अधरात्-उदायन्) विराड्रूपस्य परमात्मनः सप्त वीराः गतिमन्तः पृथिव्यादयो लोकाः अधरात् स्थूलावस्थानात्-उत्पन्नाः-उद्भूताः (उत्तरात्तात् समजग्मिरन् ते-अष्ट) सूक्ष्मरुपादष्ट वसवो वासयितारो देवा वायुप्रभृतयः सर्वत्र प्रवहमाणास्ते सञ्जाताः (पश्चातात्-स्थिविमन्तः-नव-आयन्) पश्चिमतो नव ग्रहाश्चन्द्रादयः स्थितिमन्तः-आधारमपेक्षमाणाः प्रकटीभाव-मागच्छन् (दश-अश्नः प्राक् सानु वितिरन्ति) दश व्याप्ताः प्राक्तः पूर्वाद्या दिशः सम्भजनीयं स्थानमात्रं विभावयन्ति ॥१५॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Seven off-springs came up from the deepest of Prakrti (they are five subtle elements, mind and senses), eight sprang from the upper part (they are eight vasus, sustainers of life, i.e., earth, water, fire, air, space, moon, sun and stars), from behind came nine well placed in position (they are nine planets and nine sense organs), and ten pranas arise from the front and move high up in air.