पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सप्त) = सात (वीरासः) = [वि + ईर] विशिष्टरूप से शत्रुओं को कम्पित करनेवाले मरुत् अर्थात् प्राणा (अधरात्) = नीचे से लेकर (उत् आयन्) = ऊपर तक आते हैं, ये प्राण, प्राणायाम के द्वारा सिद्धि के होने पर शरीर को नीरोग बनाते हैं, जरा ऊपर आकर मन को निर्मल करते हैं, कुछ और ऊपर उठकर ये बुद्धि को बड़ा तीव्र बना देते हैं। इस प्रकार ये प्राण मनुष्य को भी ऊपर उठानेवाले होते हैं। इस प्राण साधना के द्वारा योगदर्शन के शब्दों में 'ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्' प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। 'धारणासु च योग्यता मनसः' मन की धारणाओं में योग्यता उत्पन्न होती है, मन को देश- विशेष में बाँधना सुगम हो जाता है। [२] इस प्राण साधना को ही परिणाम होता है कि (ते अष्ट) = शरीर में मेरुदण्ड के मूल से शिखर तक रहनेवाले वे आठ चक्र (उत्तरातात्) = ऊपर (समजग्मिरन्) = संगत होते हैं। मेरुदण्ड के मूल में मूलाधार चक्र है, शिखर पर सहस्रार चक्र । मूलाधार चक्र में ही कुण्डलिनी शक्ति का निवास है । यह प्राणों की उष्णता से कुण्डल को तोड़कर ऊपर उठती है और सुषुमणा नाड़ी में से होती हुई मेरुपर्वत के शिखर पर स्थित सहस्रार चक्र के स्थान तक पहुँचती है । [३] (नव) = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ और वाणी व जिह्वा के दोनों ओर होने से ये नौ की नौ इन्द्रियाँ, विषयों से व्यावृत्त होकर (स्थिविमन्तः) = 'स्थानमन्तः ' विषयों में न भटकने से स्थित हुई हुई (पश्चात्तात्) = पीछे (आयन्) = आ जाती हैं, यही इन्द्रियों का 'प्रत्याहार' कहलाता है । [४] इस प्रकार प्रत्याहार की साधना करके (दश-प्राक्) = दसवें दशक से पूर्व ही [दशभ्यः प्राक् ], अर्थात् मरण से पूर्व ही 'प्राक् शरीर विमोक्षणात्' (अश्नः) = [अशनवतः] बड़ा खानेवाले, अर्थात् न रजनेवाले इस काम के (सानु) = शिखर को (वितिरन्ति) = नष्ट कर डालते हैं। शरीर मोक्ष से पूर्व ही काम के वेग को जीतना आवश्यक है। यदि हम इसे नहीं जीतते तो यह हमारा नाश कर देता है। इसका नाश हमारे जीवन का कारण बनता है। काम के सिर को कुचल देना ही, इसे दवा देना ही, वश में कर लेना ही इसके शिखर का नाश है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सप्त प्राण, अष्ट चक्र व नव द्वार हमारे स्वस्थ व स्वाधीन हों और हम मृत्यु से ही पूर्व ही काम-क्रोधोद्भव वेग को जीतनेवाले हों ।