Word-Meaning: - [१] हे (पूषन्) = पोषक प्रभो ! (ते रथस्य धुरम्) = आपके दिये हुए इस शरीररूप रथ की धुरा को (अजाः) = [अज गतिक्षेपणयोः] गति के द्वारा मलों को दूर करनेवाले व्यक्ति ही (आववृत्युः) = आवर्तित करते हैं, अर्थात् धारण करके कार्य में व्यापृत करते हैं। 'अज' पुरुष ही इस जीवनरथ का वहन कर पाते हैं । [२] वे प्रभु (विश्वस्य) = सब (अर्थिनः) = प्रार्थना करनेवालों के (सखा) = मित्र हैं। प्रभु ही तो हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करते हैं। वे प्रभु (सनोजा:) = चिरजात हैं, सदा से प्रादुर्भूत हैं। किसी समय विशेष में उनका प्रादुर्भाव नहीं होता, सदा से हैं, सदा रहेंगे। (अनपच्युतः) = उन प्रभु को कोई मार्ग से हटा नहीं सकता, उनकी व्यवस्था का कोई भंग नहीं कर सकता। प्रभु के नियम अटल हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम गतिशील बनकर इस शरीर रथ का वहन करनेवाले बनें। प्रार्थना द्वारा प्रभु के मित्र बनें।