देवता: पूषा
ऋषि: विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः
छन्द: पादनिचृदनुष्टुप्
स्वर: गान्धारः
आ ते॒ रथ॑स्य पूषन्न॒जा धुरं॑ ववृत्युः । विश्व॑स्या॒र्थिन॒: सखा॑ सनो॒जा अन॑पच्युतः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ā te rathasya pūṣann ajā dhuraṁ vavṛtyuḥ | viśvasyārthinaḥ sakhā sanojā anapacyutaḥ ||
पद पाठ
आ । ते॒ । रथ॑स्य । पू॒ष॒न् । अ॒जाः । धुर॑म् । व॒वृ॒त्युः॒ । विश्व॑स्य । अ॒र्थिनः॑ । सखा॑ । स॒नः॒ऽजाः । अन॑पऽच्युतः ॥ १०.२६.८
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:26» मन्त्र:8
| अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:14» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:8
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पूषन्) हे पोषक परमात्मन् ! (ते रथस्य धुरम्) तेरे रमणीय मोक्ष के धारण-साधन को (अजाः-आ ववृत्युः) स्तुतियाँ आवर्तित करती हैं-आस्थापित करती हैं (विश्वस्य-अर्थिनः) सब उपासक प्रार्थी का (सनोजाः-अनपच्युतः सखा) शाश्वतिक अनश्वर मित्र है ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के आश्रय मोक्ष धाम की प्राप्ति उसकी स्तुतियों के द्वारा होती है। प्रत्येक उपासकों का वह शाश्वतिक अनश्वर मित्र है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धुरा का आवर्तन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पूषन्) = पोषक प्रभो ! (ते रथस्य धुरम्) = आपके दिये हुए इस शरीररूप रथ की धुरा को (अजाः) = [अज गतिक्षेपणयोः] गति के द्वारा मलों को दूर करनेवाले व्यक्ति ही (आववृत्युः) = आवर्तित करते हैं, अर्थात् धारण करके कार्य में व्यापृत करते हैं। 'अज' पुरुष ही इस जीवनरथ का वहन कर पाते हैं । [२] वे प्रभु (विश्वस्य) = सब (अर्थिनः) = प्रार्थना करनेवालों के (सखा) = मित्र हैं। प्रभु ही तो हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करते हैं। वे प्रभु (सनोजा:) = चिरजात हैं, सदा से प्रादुर्भूत हैं। किसी समय विशेष में उनका प्रादुर्भाव नहीं होता, सदा से हैं, सदा रहेंगे। (अनपच्युतः) = उन प्रभु को कोई मार्ग से हटा नहीं सकता, उनकी व्यवस्था का कोई भंग नहीं कर सकता। प्रभु के नियम अटल हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम गतिशील बनकर इस शरीर रथ का वहन करनेवाले बनें। प्रार्थना द्वारा प्रभु के मित्र बनें।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पूषन्) हे पोषयितः परमात्मन् ! (ते रथस्य धुरम्) तव रमणीयस्य मोक्षस्य धारणं प्रापणं “धूः धारयतेः” [निरु० ३।९] (अजाः-आववृत्युः) वाचः स्तुतयः “वाग्वा अजा [श० ६।४।४।१५] आवर्तन्ते-आवर्तयन्ति-आस्थापयन्ति यतस्त्वम् (विश्वस्य अर्थिनः) सर्वस्योपासकस्य प्रार्थिनः (सनोजाः-अनपच्युतः सखा) सनातनकालात् प्रसिद्धः शाश्वतिकोऽनश्वरः सखाऽस्ति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Pusha, unborn, eternal and undiminishing forces move your chariot wheels on and on, friend of all supplicants of the world, eternal, unborn and infinitely manifestive, imperishable.
