कक्षीवान् की बुद्धि का वर्धन
Word-Meaning: - [१] (अयं सः) = यह वह सोम ही (घ) = निश्चय से (तुरः) = [तुर्वी हिंसायाम्] सब शत्रुओं का संहार करनेवाला है (मदः) = स्वयं आनन्दस्वरूप होता हुआ, शत्रुओं के संहार के द्वारा हमारे आनन्द को बढ़ानेवाला है । यह प्रभु ही (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष की (प्रियः) = प्रीति को पैदा करनेवाला है। जितेन्द्रिय पुरुष प्रकृति-प्रवण न होकर सदा प्रभु-प्रवण होता है, उसे प्रभु-भजन में आनन्द का अनुभव होता है। यह प्रभु सदा वर्धत = अपने स्वरूप में बढ़े हुए हैं 'वर्धमानं स्वेदमे' । प्रभु में कभी कोई कमी न थी, वे सदा से प्रवृद्ध हैं । [२] (अयम्) = ये प्रभु (कक्षीवतः) = दृढ़ कक्ष्या [=कटिबन्ध] वाले, दृढ़ निश्चयी, लक्ष्य पर पहुँचने के लिए कटिबद्ध, (महः) - [मह पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाले और इस पूजा के द्वारा (विप्रस्य) = [वि-प्रा- पूरणे] विशिष्टरूप से अपना पूरण करनेवाले पुरुष की (मतिम्) = बुद्धि को (वर्धयत्) = बढ़ाते हैं । वस्तुतः इस प्रकार बुद्धि को बढ़ा करके ही वे इसकी वृद्धि को कारण बनते हैं । [३] हे प्रभो ! आप जब बुद्धि को बढ़ाते हैं तभी (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = विशिष्ट आनन्द में यह 'विमद' (विवक्षसे) = विशिष्ट उन्नति के लिए होता है। बुद्धि-वर्धन के बिना किसी भी प्रकार की उन्नति का सम्भव नहीं होता।
Connotation: - भावार्थ - हे प्रभो! आप हमारी वासना को विनष्ट करके, बुद्धि को शुद्ध व वृद्ध कीजिए जिससे हम उन्नतिपथ पर आगे बढ़ सकें। हम भी 'कक्षीवान्, महस् व विप्र' बनकर बुद्धि-वर्धन के पात्र बनें।