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अ॒यं घ॒ स तु॒रो मद॒ इन्द्र॑स्य वर्धत प्रि॒यः । अ॒यं क॒क्षीव॑तो म॒हो वि वो॒ मदे॑ म॒तिं विप्र॑स्य वर्धय॒द्विव॑क्षसे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ gha sa turo mada indrasya vardhata priyaḥ | ayaṁ kakṣīvato maho vi vo made matiṁ viprasya vardhayad vivakṣase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । घ॒ । सः । तु॒रः । मदः॑ । इन्द्र॑स्य । व॒र्ध॒त॒ । प्रि॒यः । अ॒यम् । क॒क्षीव॑तः । म॒हः । वि । वः॒ । मदे॑ । म॒तिम् । विप्र॑स्य । व॒र्ध॒य॒त् । विव॑क्षसे ॥ १०.२५.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:25» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:10


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) आत्मा का (अयं घ सः) यह सचमुच वह (तुरः प्रियः-मदः-वर्धत) शीघ्र स्वभाववाला प्रिय हर्षदायक शान्तस्वरूप परमात्मा आत्मा के हृदय में बढ़ता है-साक्षात् होता है। (महः कक्षीवतः-विप्रस्य-अयं मतिम्-वर्धयत्) महान् तथा संयम बाँधनेवाले स्तुतिकर्ता विद्वान् की बुद्धि को बढ़ाता है। (वः-मदे वि) तेरी हर्षनिमित्त विशिष्टरूप से हम स्तुति करते हैं। (विवक्षसे) तू महान् है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - शीघ्र प्रियकारी परमात्मा उपासक के हृदय में साक्षात् होता है। वह संयमी उपासक की बुद्धि को बढ़ाता है, उत्पन्न करता है। इसलिये उसकी स्तुति करनी चाहिये ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कक्षीवान् की बुद्धि का वर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयं सः) = यह वह सोम ही (घ) = निश्चय से (तुरः) = [तुर्वी हिंसायाम्] सब शत्रुओं का संहार करनेवाला है (मदः) = स्वयं आनन्दस्वरूप होता हुआ, शत्रुओं के संहार के द्वारा हमारे आनन्द को बढ़ानेवाला है । यह प्रभु ही (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष की (प्रियः) = प्रीति को पैदा करनेवाला है। जितेन्द्रिय पुरुष प्रकृति-प्रवण न होकर सदा प्रभु-प्रवण होता है, उसे प्रभु-भजन में आनन्द का अनुभव होता है। यह प्रभु सदा वर्धत = अपने स्वरूप में बढ़े हुए हैं 'वर्धमानं स्वेदमे' । प्रभु में कभी कोई कमी न थी, वे सदा से प्रवृद्ध हैं । [२] (अयम्) = ये प्रभु (कक्षीवतः) = दृढ़ कक्ष्या [=कटिबन्ध] वाले, दृढ़ निश्चयी, लक्ष्य पर पहुँचने के लिए कटिबद्ध, (महः) - [मह पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाले और इस पूजा के द्वारा (विप्रस्य) = [वि-प्रा- पूरणे] विशिष्टरूप से अपना पूरण करनेवाले पुरुष की (मतिम्) = बुद्धि को (वर्धयत्) = बढ़ाते हैं । वस्तुतः इस प्रकार बुद्धि को बढ़ा करके ही वे इसकी वृद्धि को कारण बनते हैं । [३] हे प्रभो ! आप जब बुद्धि को बढ़ाते हैं तभी (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = विशिष्ट आनन्द में यह 'विमद' (विवक्षसे) = विशिष्ट उन्नति के लिए होता है। बुद्धि-वर्धन के बिना किसी भी प्रकार की उन्नति का सम्भव नहीं होता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हे प्रभो! आप हमारी वासना को विनष्ट करके, बुद्धि को शुद्ध व वृद्ध कीजिए जिससे हम उन्नतिपथ पर आगे बढ़ सकें। हम भी 'कक्षीवान्, महस् व विप्र' बनकर बुद्धि-वर्धन के पात्र बनें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) आत्मनः (अयं घ सः) एष खलु सः (तुरः प्रियः मदः वर्धत) त्वरणशीलः प्रियो हर्षकरः सोमः शान्तस्वरूपः परमात्मा तस्यात्मनो हृदये वर्धते-साक्षाद् भवति। (महः कक्षीवतः विप्रस्य अयं मतिम् वर्धयत्) महतः कक्ष्यावतः “कक्षीवान् कक्ष्यावान्” [निरु ६।१०] संयमकक्षागतस्य विप्रस्य स्तुतिप्रेरकस्य बुद्धिं वर्धयति। (वः-मदे वि) त्वां हर्षनिमित्तं विशिष्टतया स्तुमः (विवक्षसे) त्वं महानसि ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, instant fast, dear happy friend of Indra, the soul, is great, advances the wisdom and vision of the great sage dedicated to assiduous thought and work with concentration. Surely, O Soma, you are waxing great and glorious in your joy for the good of all.