Go To Mantra

इ॒ह श्रु॒त इन्द्रो॑ अ॒स्मे अ॒द्य स्तवे॑ व॒ज्र्यृची॑षमः । मि॒त्रो न यो जने॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या ॥

English Transliteration

iha śruta indro asme adya stave vajry ṛcīṣamaḥ | mitro na yo janeṣv ā yaśaś cakre asāmy ā ||

Mantra Audio
Pad Path

इ॒ह । श्रु॒तः । इन्द्रः॑ । अ॒स्मे इति॑ । अ॒द्य । स्तवे॑ । व॒ज्री । ऋची॑षमः । मि॒त्रः । न । यः । जने॑षु । आ । यशः॑ । च॒क्रे । असा॑मि । आ ॥ १०.२२.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:22» Mantra:2 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:6» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:2


Reads 438 times

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः इन्द्रः) जो ऐश्वर्यवान् परमात्मा (जनेषु मित्रः-न) उपासक जनों में मित्र-स्नेही के समान (असामि यशः-आ चक्रे) अनु-समाप्त-अर्थात् परिपूर्ण यश और अन्न तथा धन को भलीभाँति प्राप्त कराता है (इह) यहाँ जनसमाज में (श्रुतः) प्रसिद्ध (वज्री) ओजस्वी (ऋचीषमः) मन्त्रों का दर्शानेवाला अतएव स्तुति करनेवाले ऋषियों के लिए यश प्रदान करता है अथवा स्तुति करनेवालों का मान करता है, उसको उत्कर्ष की ओर ले जाता है, अन्न का दान करता है या स्तुति के समान स्तुति के अनुरूप हुआ उसी के अनुरूप फल प्रदान करता है। वह धन देनेवाला भी है, ऐसा वह परमात्मा (अद्य-अस्मे स्तवे) इस काल में हम उपासकों के द्वारा स्तुत किया जाता है ॥२॥
Connotation: - परमात्मा मनुष्यों में मित्र के समान पूर्णरूप से यश अन्न और धन प्राप्त कराता है, मन्त्रों का परिज्ञान कराता है, स्तोताओं का मान करता है और स्तुति के अनुरूप फल देता है। ऐसा वह परमात्मा हमारे लिए उपासनीय है ॥२॥
Reads 438 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'वज्री - ऋचीषम' प्रभु

Word-Meaning: - [१] (इह) = इस मानव जीवन में (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (श्रुतः) = सुना जाता है । अर्थात् इस मानव योनि में ही हम उस प्रभु की वाणी को सुनने के लिये समर्थ होते हैं । पशु-पक्षियों को यह योग्यता प्राप्त नहीं। [२] (अस्मे) = हमारे से (अद्य) = आज स्तवे उस प्रभु का स्तवन किया जाता है। जो प्रभु (वज्री) = क्रियाशीलता रूपी वज्र के द्वारा सब शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं। (ऋचीषमः) = 'ऋचा समः ' ऋचाओं में की गई गुणवर्णना के समान हैं। 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ' सब ऋचाएँ उस आकाशवत् व्यापक परम अविनाशी प्रभु में स्थित हैं। इन ऋचाओं में प्रभु की महिमा का ही वर्णन है । [३] यह 'वज्री - ऋचीषम- इन्द्र' वह है (यः) = जो कि (मित्रः न) = एक सच्चे मित्र की तरह अथवा सूर्य की तरह (जनेषु) = अपनी शक्तियों के प्रादुर्भाव के लिये पुरुषार्थ करनेवाले लोगों में (असामि) = पूर्ण (यशः) = प्रकाश व ज्ञान को (आचक्रे) = सब प्रकार से करते हैं। प्रभु हमें प्रकाश प्राप्त कराते हैं। इस प्रकाश में किसी प्रकार की कमी नहीं होती । परन्तु यह प्रकाश प्राप्त उन्हीं को होता है जो कि अपने विकास के लिये यत्नशील होते हैं। वस्तुतः जैसे सूर्य का प्रकाश सर्वत्र समरूप से फैलता है उसी प्रकार प्रभु का ज्ञान भी प्रत्येक हृदय में प्रकाशित होता है । उल्लू सूर्य के प्रकाश का लाभ नहीं उठा पाता, इसी प्रकार सांसारिक विषयों के पीछे उन्मत्त होनेवाले पुरुष उस प्रभु के प्रकाश को नहीं देख पाते। इन मोहमदिरा को पीकर उन्मत्त हुए हुए पुरुषों के लिये उस प्रकाश की प्राप्ति नहीं होती ।
Connotation: - भावार्थ- वे प्रभु पूर्ण प्रकाश को प्राप्त करानेवाले हैं। इस प्रकाश को प्राप्त वही करते हैं, जो कि अपनी शक्तियों के विकास के लिये यत्नशील होते हैं ।
Reads 438 times

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः इन्द्रः) य ऐश्वर्यवान् परमात्मा (जनेषु मित्रः न) जनेषु-उपासकेषु मित्रः स्नेहीव (असामि यशः-आ चक्रे) असुसमाप्तं परिपूर्णं “असामि-असुसमाप्तम्” [निरु० ६।२३] यशश्च-अन्नं च “यशोऽन्ननाम” [निघ० २।७] धनं च “यशो धननाम” [निघ० २।१०] समन्तात् करोति सः (इह) अत्र जनसमाजे (श्रुतः) प्रसिद्धः (वज्री) ओजस्वी “वज्रो वा ओजः” [श० ८।४।१।२०] (ऋचीषमः) ऋचीनामृचां मन्त्राणां गमयिता दर्शयिता-अत एव यशो ददाति स्तोतृभ्यः-ऋषिभ्यः यद्वा-ऋचीषां स्तोतृणां माता-उत्कर्षयिता, अत एवान्नं ददाति, अथवा-ऋचा समः-स्तुत्या समः स्तुतेरनुरूपो भूतस्तदनुरूपस्य फलस्य प्रदाता, अत एव धनं ददाति, इत्थम्भूतः (अद्य-अस्मे स्तवे) अवरकालेऽस्माभिरुपासकैः स्तूयते। ‘ऋचीषमः’ शब्दोऽनेकार्थः, निरुक्ते नैगमप्रकरणे पठितत्वात् ॥२॥
Reads 438 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, lord of justice and thunder is renowned and sung here among us, most adorable worthy of worship for us, who is glorified among people, perfect and absolute and kind as a friend.