Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार (यः गोपाः) = जो मैं इन्द्रियों का रक्षक बनता हूँ, इन्द्रियरूपी गौवों का पोषण करनेवाला 'गोपति' होता हूँ, वह मैं (तं अपिहुवे) = उस-उस चीज को समुचित रूप में प्रार्थित करता हूँ, इन सब चीजों को चाहता हूँ । किनको ? [क] (यत् नियानं) = जो इन्द्रियरूप गौवों का नियमेन जाने का स्थान है, जिसे सामान्य भाषा में 'गोष्ठ' कहते हैं। यहाँ इन्द्रियरूप गौवों का 'गोष्ठ' यह हमारा अपना शरीर ही है। प्राणमयकोश का [प्राणाः वाव इन्द्रियाणि] आधार यह अन्नमयकोश ही है। एवं यह अन्नमयकोश बिलकुल ठीक हो जिससे इसमें इन्द्रियों का निवास ठीक प्रकार से हो सके। [ख] (न्ययनम्) = मैं न्ययन की भी प्रार्थना करता हूँ। इन इन्द्रियरूप गौवों का ज्ञातव्य विषय रूप चारागाहों में निश्चय से जाना ही न्ययन है। [ग] वहाँ जाकर (संज्ञानं) = विषयों को उत्तमता से, सम्यक्तया जानना ही संज्ञान है इस संज्ञान की भी मैं प्रार्थना करता हूँ। [घ] संज्ञान के बाद (यत्) = जो (परायणम्) = फिर वापिस आना है इसकी भी मैं प्रार्थना करता हूँ। [२] इस प्रकार संक्षेप में यह जो इन्द्रियों का (आवर्तनम्) = ज्ञान प्राप्ति के लिये विषयों में [turning round and round] सब ओर विचरना है, नाना तथ्यों का संग्रहण है, इसकी मैं प्रार्थना करता हूँ। और (निवर्तनम्) =' विषयों में आसक्त न होकर, लौट आना है' उसकी मैं प्रार्थना करता हूँ । इन्द्रियाँ विषयों में जायें, उनका ज्ञान प्राप्त करें, परन्तु ये उनमें कभी उलझ न जायें ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु कृपा से मैं गोपा बनकर आत्मवश्य इन इन्द्रियों से विषयों में विचरता हुआ उनका तत्त्वज्ञान प्राप्त करूँ। मेरी इन्द्रियाँ विषयों में न फँस जाएँ ।