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यन्नि॒यानं॒ न्यय॑नं सं॒ज्ञानं॒ यत्प॒राय॑णम् । आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑नं॒ यो गो॒पा अपि॒ तं हु॑वे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yan niyānaṁ nyayanaṁ saṁjñānaṁ yat parāyaṇam | āvartanaṁ nivartanaṁ yo gopā api taṁ huve ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । नि॒ऽयान॑म् । नि॒ऽअय॑नम् । स॒म्ऽज्ञान॑म् । यत् । प॒रा॒ऽअय॑नम् । आ॒ऽवर्त॑नन् । नि॒ऽवर्त॑नम् । यः । गो॒पाः । अपि॑ । तम् । हु॒वे॒ ॥ १०.१९.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:19» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-नियानम्) गौओं, प्रजाओं और इन्द्रियों का जो नियत नैत्यिक कार्य में गमन है (नि-अयनम्) तथा फिर नियत नैत्यिक निश्रयण-रहना (संज्ञानम्) संल्लाभ-दुग्धादि, उपहार वा भोग देना (यत् परायणम्) जो दूरगमन-स्वकार्य से निवृत्त होना है और (आवर्तनम्) पुनः प्रवृत्त होना (निवर्तनम्) कार्य से विराम करना, आदि क्रियाओं का (यः गोपाः-अपि तं हुवे) जो सब ओर से गोस्वामी, प्रजापति इन्द्रियस्वामी परमात्मा है, उसकी प्रार्थना करता हूँ ॥४॥
भावार्थभाषाः - गौओं, प्रजाओं, इन्द्रियों का नित्य स्वकार्य में प्रवेश होना-जाना-स्थिर होना और उनसे लाभ लेना; कार्य से पुनः निवृत्त होना फिर कार्य में लगना आदि क्रियाएँ सब रक्षक परमात्मा के अधीन हैं। उसकी हम स्तुति करें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आवर्तन-निवर्तन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार (यः गोपाः) = जो मैं इन्द्रियों का रक्षक बनता हूँ, इन्द्रियरूपी गौवों का पोषण करनेवाला 'गोपति' होता हूँ, वह मैं (तं अपिहुवे) = उस-उस चीज को समुचित रूप में प्रार्थित करता हूँ, इन सब चीजों को चाहता हूँ । किनको ? [क] (यत् नियानं) = जो इन्द्रियरूप गौवों का नियमेन जाने का स्थान है, जिसे सामान्य भाषा में 'गोष्ठ' कहते हैं। यहाँ इन्द्रियरूप गौवों का 'गोष्ठ' यह हमारा अपना शरीर ही है। प्राणमयकोश का [प्राणाः वाव इन्द्रियाणि] आधार यह अन्नमयकोश ही है। एवं यह अन्नमयकोश बिलकुल ठीक हो जिससे इसमें इन्द्रियों का निवास ठीक प्रकार से हो सके। [ख] (न्ययनम्) = मैं न्ययन की भी प्रार्थना करता हूँ। इन इन्द्रियरूप गौवों का ज्ञातव्य विषय रूप चारागाहों में निश्चय से जाना ही न्ययन है। [ग] वहाँ जाकर (संज्ञानं) = विषयों को उत्तमता से, सम्यक्तया जानना ही संज्ञान है इस संज्ञान की भी मैं प्रार्थना करता हूँ। [घ] संज्ञान के बाद (यत्) = जो (परायणम्) = फिर वापिस आना है इसकी भी मैं प्रार्थना करता हूँ। [२] इस प्रकार संक्षेप में यह जो इन्द्रियों का (आवर्तनम्) = ज्ञान प्राप्ति के लिये विषयों में [turning round and round] सब ओर विचरना है, नाना तथ्यों का संग्रहण है, इसकी मैं प्रार्थना करता हूँ। और (निवर्तनम्) =' विषयों में आसक्त न होकर, लौट आना है' उसकी मैं प्रार्थना करता हूँ । इन्द्रियाँ विषयों में जायें, उनका ज्ञान प्राप्त करें, परन्तु ये उनमें कभी उलझ न जायें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु कृपा से मैं गोपा बनकर आत्मवश्य इन इन्द्रियों से विषयों में विचरता हुआ उनका तत्त्वज्ञान प्राप्त करूँ। मेरी इन्द्रियाँ विषयों में न फँस जाएँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत् नियानम्) गवां प्रजानामिन्द्रियाणां वा यत् खलु नियतं नैत्यिकं स्वकार्ये गमनम् (नि-अयनम्) तथा पुनर्नियतं नैत्यिकं निश्रयणम् (संज्ञानम्) संल्लाभो दुग्धादिकं भोग उपहारो वा (यत् परायणम्) यत् खलु दूरगमनं स्वकार्यान्निवर्तनम् (आवर्तनम्) पुनः प्रवर्तनम् (निवर्तनम्) कार्याद् विरमणम् (यः-गोपाः अपि तं हुवे) यः सर्वतो गोस्वामी प्रजापतिः, इन्द्रियस्वामी परमात्मा तमपि प्रार्थये ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Of the people in the society, of the dynamics of wealth in the socio-political system, of the fluctuations of mind and sense in the individual personality, the movement outward, movement inward, conscious balance and equilibrium, the expense out again, withdrawal, release and hold, I watch, and I invoke and call up whoever is the keeper, ruler and master.