Word-Meaning: - [१] इन्द्रियाँ क्योंकि उस उस विषय का ग्रहण करने के स्वभाव वाली हैं, सो ये इन्द्रियाँ उन विषयों में जायेंगी तो सही परन्तु जीव से कहते हैं कि तू पुनः- फिर एना = इन को निवर्तय-लौटा। ये विषयों में जायें तो सही, फिर उनमें फँसकर वहीं न रह जाएँ। जैसे एक देश के युवक ज्ञान प्राप्ति के लिये विदेशों में जायें तो सही, परन्तु वे वहाँ की चमक [glase] से चुँधियाकर वहीं न रह जाएँ। [२] हे जीव ! तू (पुनः) = फिर (एना) = इन इन्द्रियों को (न्याकुरु) = निश्चय से आत्मायत्त [= अपने अधीन] करनेवाला हो। [३] (इन्द्रः) = इन्द्र वही है जो कि (एना) = इनको (नियच्छतु) = निश्चय से अपने वश में करे । इन्द्रियों का अधिष्ठाता ही तो 'इन्द्र' कहलाता है । [४] (अग्निः) = [अग्रेणी:] अपने को अग्र स्थान में प्राप्त करानेवाला वह है जो कि (एना) = इन इन्द्रियों को (उपाजतु) = प्रभु की उपासना के साथ गतिशील बनाता है [ उप + अजतु] । प्रभु का स्मरण करता है और जीवन-संग्राम को जारी रखता है। प्रभु स्मरण पूर्वक क्रिया में लगे रहने से सब मलों का दूरीकरण [क्षेपण] हो जाता है। यही 'उपाजन' कहलाता है ।
Connotation: - भावार्थ - विषयगामिनी इन्द्रियों को हम विषयों से लौटाएँ, उन्हें आत्मायत्त करें । इन्द्रियों को आत्मायत्त करके अपने 'इन्द्र' नाम को सार्थक करें। प्रभु की समीपता [उप] में रहते हुए क्रियाशील हों [अज-गति] जिससे मलों का विक्षेपण होकर हम अग्रेणी व अग्नि बनें।