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पुन॑रेना॒ नि व॑र्तय॒ पुन॑रेना॒ न्या कु॑रु । इन्द्र॑ एणा॒ नि य॑च्छत्व॒ग्निरे॑ना उ॒पाज॑तु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

punar enā ni vartaya punar enā ny ā kuru | indra eṇā ni yacchatv agnir enā upājatu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पुनः॑ । ए॒नाः॒ । नि । व॒र्त॒य॒ । पुनः॑ । ए॒नाः॒ । नि । आ । कु॒रु॒ । इन्द्र॑ । ए॒नाः॒ । नि । य॒च्छ॒तु॒ । अ॒ग्निः । ए॒नाः॒ । उ॒प॒ऽआज॑तु ॥ १०.१९.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:19» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एनाः पुनः निवर्तय) हे गौवों के स्वामी ! हे प्रजारक्षक ! हे प्रशस्त इन्द्रियवाले आत्मन् ! तू इन गौवों, प्रजाओं और इन्द्रियों को विषयमार्ग से रोक (एनाः पुनः नि-आ कुरु) इन गौ आदि को फिर नियन्त्रित कर-अपने अधीन कर (इन्द्रः एनाः नियच्छतु) ऐश्वर्यवान् परमात्मा भी इनको नियन्त्रित करे या इनके नियन्त्रण में मुझे समर्थ करे (अग्निः-एनाः-उपाजतु) अग्रणायक परमात्मा इन गौ आदि को मेरी अधीनता के लिए प्रेरित करे ॥२॥
भावार्थभाषाः - गौ आदि पशुओं, प्रजाओं, तथा इन्द्रियों को नित्य नियम में रखना चाहिए और परमात्मा से इनके यथावत् नियन्त्रण के लिए बल माँगना चाहिए ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आत्मायत्तता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] इन्द्रियाँ क्योंकि उस उस विषय का ग्रहण करने के स्वभाव वाली हैं, सो ये इन्द्रियाँ उन विषयों में जायेंगी तो सही परन्तु जीव से कहते हैं कि तू पुनः- फिर एना = इन को निवर्तय-लौटा। ये विषयों में जायें तो सही, फिर उनमें फँसकर वहीं न रह जाएँ। जैसे एक देश के युवक ज्ञान प्राप्ति के लिये विदेशों में जायें तो सही, परन्तु वे वहाँ की चमक [glase] से चुँधियाकर वहीं न रह जाएँ। [२] हे जीव ! तू (पुनः) = फिर (एना) = इन इन्द्रियों को (न्याकुरु) = निश्चय से आत्मायत्त [= अपने अधीन] करनेवाला हो। [३] (इन्द्रः) = इन्द्र वही है जो कि (एना) = इनको (नियच्छतु) = निश्चय से अपने वश में करे । इन्द्रियों का अधिष्ठाता ही तो 'इन्द्र' कहलाता है । [४] (अग्निः) = [अग्रेणी:] अपने को अग्र स्थान में प्राप्त करानेवाला वह है जो कि (एना) = इन इन्द्रियों को (उपाजतु) = प्रभु की उपासना के साथ गतिशील बनाता है [ उप + अजतु] । प्रभु का स्मरण करता है और जीवन-संग्राम को जारी रखता है। प्रभु स्मरण पूर्वक क्रिया में लगे रहने से सब मलों का दूरीकरण [क्षेपण] हो जाता है। यही 'उपाजन' कहलाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विषयगामिनी इन्द्रियों को हम विषयों से लौटाएँ, उन्हें आत्मायत्त करें । इन्द्रियों को आत्मायत्त करके अपने 'इन्द्र' नाम को सार्थक करें। प्रभु की समीपता [उप] में रहते हुए क्रियाशील हों [अज-गति] जिससे मलों का विक्षेपण होकर हम अग्रेणी व अग्नि बनें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एनाः पुनः-निवर्तय) हे गोपते ! प्रजापते ! इन्द्रियस्वामिन्-आत्मन् वा त्वमेताः-गाः, प्रजाः, इन्द्रियाणि वा पुनर्विषयमार्गात् खलु प्रत्यावर्तयावरोधय (एनाः पुनः-नि-आ कुरु) एताः खलु गवाद्याः पुनरपि नियन्त्रिताः कुरु स्वाधीनाः कुरु (इन्द्रः-एनाः-नियच्छतु) ऐश्वर्यवान् परमात्माऽप्येताः खलु नियमयतु नियन्त्रणे मां समर्थयतु (अग्निः-एनाः उपाजतु) अग्रणायकः परमात्मा खल्वेता गवाद्या ममाधीने प्रेरयतु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O ruler, keep the dynamics in motion and circulation, control them back and forth. Let Indra, the controller, keep them in controlled circulation. Let Agni, the enlightened, keep them in radiation, watch them and keep them in ordered motion.