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अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒ तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः । यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम् ॥

English Transliteration

ajo bhāgas tapasā taṁ tapasva taṁ te śocis tapatu taṁ te arciḥ | yās te śivās tanvo jātavedas tābhir vahainaṁ sukṛtām u lokam ||

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Pad Path

अ॒जः । भा॒गः । तप॑सा॒ । तम् । त॒प॒स्व॒ । तम् । ते॒ । शो॒चिः । त॒प॒तु॒ । तम् । ते॒ । अ॒र्चिः । याः । ते॒ । शि॒वाः । त॒न्वः॑ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । ताभिः॑ । व॒ह॒ । ए॒न॒म् । सु॒ऽकृता॑म् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् ॥ १०.१६.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:16» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:20» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अजः भागः तं तपसा तपस्व तं ते शोचिः तपतु तं ते-अर्चिः) सर्वत्र विराजमान यह अग्नितत्त्व इस अजन्मा जीव को अपने पार्थिव ज्वलन धर्म से ऊपर प्रेरण करता है तथा अग्नि का अन्तरिक्षस्थ तेज उसी जीव को ऊपर की ओर प्रेरित करता है और द्युस्थान रश्मितेज भी और आगे बढता है (याः-ते शिवाः तन्वः ताभिः-एनं सुकृताम्-उ-लोके वह) जो कल्याणकारी फैलनेवाली तैजस धारायें हैं, उनके द्वारा अग्नि इस जीव को पुण्य शुद्ध जन्म की ओर ले जाता है ॥४॥
Connotation: - देहान्त के साथ ही अग्नितत्त्व जो सब जगह तेजोरूप से वर्तमान है, वह पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान के क्रम से ले जाता है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

देवों द्वारा प्रभु का धारण

Word-Meaning: - [१] (अज:) = [अ+ज] कभी शरीर को न धारण करनेवाला, न पैदा होनेवाला, अथवा 'अज् गतिक्षेपणयोः'=गति के द्वारा सब बुराइयों को दूर करनेवाला प्रभु ही (भाग:) = तेरा उपास्य है [भज सेवायाम्] प्रभु का ही तूने उपासन करना है। (तं) = उस प्रभु को (तपसा) = तप के द्वारा (तपस्व) = तू दीप्त कर । सर्वव्यापकता के नाते अपने हृदयाकाश में वर्तमान उस प्रभु को तू तप से देखनेवाला हो । [२] (तम्) = उस प्रभु को (ते) = तेरी (शोचिः) = [शुच्] पवित्रता व ज्ञानदीप्ति (तपतु) = दीप्त करे, प्रकाशित करे । (तम्) = उस प्रभु को (ते) = तेरी (अर्चिः) = [अर्च पूजायाम्] = पूजा व उपासना दीप्त करे। प्रभु का दर्शन पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना से ही सम्भव है । [३] हे (जातवेदः) = विकसित ज्ञान वाले 'दमन' (या:) = जो (ते) = तेरी (शिवाः तन्वः) = कल्याणमय व शुभ शरीर हैं (ताभिः) = उन से (एनम्) = इस प्रभु को वह तू धारण करनेवाला बन, जो प्रभु (उ) = निश्चय से (सुकृताम्) = पुण्यशील लोगों के (लोकम्) = निवास-स्थान है । पुण्यशील लोग उस तृतीय धाम प्रभु में ही विचरण करते हैं । इस प्रभु को हम तभी धारण कर सकते हैं जब कि हम अपने शरीरों को निर्दोष बना पाते हैं । शरीरों की निर्दोषता के लिये 'तप, पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना' साधन हैं। इन साधनों का ही उल्लेख मन्त्र के पूर्वार्ध में 'तपसा, शोचिः व अर्चि: ' इन शब्दों से हुआ है ।
Connotation: - भावार्थ - हम 'तप, पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना' से शरीरों को निर्दोष बनाते हुए उस प्रभु को धारण करनेवाले बनें, जिन प्रभु में पुण्यशील लोग निवास करते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अजः-भागः-तं तपसा तपस्व तं ते शोचिः-तपतु तं ते-अर्चिः) हे सर्वत्र विराजमानाग्ने ! अग्निर्वा योऽयमजन्मा जीवस्तं ज्वलनेन पृथिवीस्थेन तेजसा तपसोर्ध्वं प्रेरय प्रेरयति वा। तं ते शोचिर्ज्वलनमन्तरिक्षस्थं तपतूर्ध्वं प्रेरयतु, तं तेऽर्चिर्द्युस्थानं ज्वलनं तपतूर्ध्वं प्रेरयतु। “तपः, शोचिः, अर्चिः, ज्वलतो नामधेयानि” [निघ०१। १७] (याः ते शिवाः-तन्वः-ताभिः एनं सुकृताम्-उ-लोके वह) याः कल्याणकारिण्यस्तन्वः प्रसरणशीलास्तैजसधारास्ताभिरेनं जीवं पुण्यकृतलोकं स्थानं नय ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Jataveda, that part of human personality which is unborn and eternal is the soul, purify and season it to its original purity by the heat of your divine discipline. May your light and fire purify and shine it to its purity and lustre beyond the dross. And by those divine natural potentials of yours which are holy and blissful, pray carry this soul to noble body forms in blessed regions of life.