देवों द्वारा प्रभु का धारण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अज:) = [अ+ज] कभी शरीर को न धारण करनेवाला, न पैदा होनेवाला, अथवा 'अज् गतिक्षेपणयोः'=गति के द्वारा सब बुराइयों को दूर करनेवाला प्रभु ही (भाग:) = तेरा उपास्य है [भज सेवायाम्] प्रभु का ही तूने उपासन करना है। (तं) = उस प्रभु को (तपसा) = तप के द्वारा (तपस्व) = तू दीप्त कर । सर्वव्यापकता के नाते अपने हृदयाकाश में वर्तमान उस प्रभु को तू तप से देखनेवाला हो । [२] (तम्) = उस प्रभु को (ते) = तेरी (शोचिः) = [शुच्] पवित्रता व ज्ञानदीप्ति (तपतु) = दीप्त करे, प्रकाशित करे । (तम्) = उस प्रभु को (ते) = तेरी (अर्चिः) = [अर्च पूजायाम्] = पूजा व उपासना दीप्त करे। प्रभु का दर्शन पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना से ही सम्भव है । [३] हे (जातवेदः) = विकसित ज्ञान वाले 'दमन' (या:) = जो (ते) = तेरी (शिवाः तन्वः) = कल्याणमय व शुभ शरीर हैं (ताभिः) = उन से (एनम्) = इस प्रभु को वह तू धारण करनेवाला बन, जो प्रभु (उ) = निश्चय से (सुकृताम्) = पुण्यशील लोगों के (लोकम्) = निवास-स्थान है । पुण्यशील लोग उस तृतीय धाम प्रभु में ही विचरण करते हैं । इस प्रभु को हम तभी धारण कर सकते हैं जब कि हम अपने शरीरों को निर्दोष बना पाते हैं । शरीरों की निर्दोषता के लिये 'तप, पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना' साधन हैं। इन साधनों का ही उल्लेख मन्त्र के पूर्वार्ध में 'तपसा, शोचिः व अर्चि: ' इन शब्दों से हुआ है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'तप, पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व उपासना' से शरीरों को निर्दोष बनाते हुए उस प्रभु को धारण करनेवाले बनें, जिन प्रभु में पुण्यशील लोग निवास करते हैं ।