देवों के साथ लाड़ाई का न होना
Word-Meaning: - [१] कभी-कभी पिता पुत्र में भी संघर्ष हो जाता है, पुत्र अलग घर बना लेता है और उसका पितृगृह में आना जाना नहीं रहता । यहाँ 'सूर्य' पिता है तो शरीर में अक्षि में निवास करनेवाली चक्षु उसका पुत्र है। 'वात' पिता है, शरीरस्थ प्राण उसका पुत्र है। 'द्युलोक' पिता है, 'मस्तिष्क' पुत्र । 'पृथिवी' पिता है, 'शरीर' पुत्र। ' अन्तरिक्ष' पिता है, 'हृदय' पुत्र । इन से पिता पुत्रों का संघर्ष हो जाए तो सारा स्वास्थ्य ही समाप्त हो जाए । सो कहते हैं कि (चक्षुः) = तेरी आँख (सूर्यं गच्छतु) = सूर्य को जाये। सूर्य के यहां उसका आना-जाना बना रहे। सूर्य के साथ चक्षु का संघर्ष होते ही चक्षु विकृत हो जाती है, वैदिक संस्कृति में सूर्याभिमुख होकर ध्यान करने का विधान इस दृष्टिकोण से कितना महत्त्वपूर्ण है ? हम प्रभु का ध्यान करते हैं, और 'सूर्य' आँख को शक्ति देता है । [२] (आत्मा) = [ प्राणः सा० ] तेरा प्राण (वातम्) = वायु के प्रति जानेवाला हो। शुद्ध वायु में प्राणायाम के द्वारा कौन-सा दोष दूर नहीं किया जा सकता ? [३] इसी प्रकार (द्यां च गच्छ) = तू मस्तिष्क के दृष्टिकोण से द्युलोक को जा । तेरे मस्तिष्क व द्युलोक में अनुकूलता हो । द्युलोक के सूर्य व नक्षत्रों की तरह तेरे मस्तिष्क में भी ज्ञान-विज्ञान के सूर्य व नक्षत्र चमकें । [४] (पृथिवीं च) = तू शरीर से पृथिवी को जानेवाला बन । 'अखाड़े में लोटना-पोटना व शरीर पर भस्म रमाना' शारीरिक दोषों को दूर करता है । मट्टी की रोटी पेट पर रखने से ज्वर उतर जाता है। यही शरीर के विषों को खैंच लेती है । [५] (अपो वा गच्छ) = [आपः = अन्तरिक्ष] हृदय के दृष्टिकोण से तू अन्तरिक्ष को जानेवाला हो । जैसे 'अन्तरिक्ष' [अन्तरिक्ष] द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में है, इसी प्रकार तेरा हृदय सदा मध्यमार्ग का सेवन करनेवाला हो, वहाँ 'अकामता' न हो और 'कामात्मता' भी न हो जाए। [६] इस प्रकार सदा बना रहे । (धर्मणा) = शरीर के धारण के हेतु से यह आवश्यक है। जब देवों के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, तब शरीर का धारण न होकर शरीर भी गिर जाता है। सो (यदि) = यदि (तत्र) = वहां देवों में (ते हितम्) = तेरा स्थापन [ धा + क्त] होना है (शरीरैः) = इन स्थूल व सूक्ष्म शरीरों से तू (ओषधीषु प्रतितिष्ठा) = ओषधियों में प्रतिष्ठित हो । अर्थात् तू शरीरों के धारण के लिये ओषधियों, वानस्पतिक भोजनों का ही प्रयोग कर ।
Connotation: - भावार्थ- सूर्य आदि देवों के साथ हमारी अनुकूलता बनी रहे । हम इसके लिये वानस्पतिक भोजनों का ही प्रयोग करें। देव वनस्पति का ही सेवन करते हैं।