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सूर्यं॒ चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑णा । अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा॒ शरी॑रैः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sūryaṁ cakṣur gacchatu vātam ātmā dyāṁ ca gaccha pṛthivīṁ ca dharmaṇā | apo vā gaccha yadi tatra te hitam oṣadhīṣu prati tiṣṭhā śarīraiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सूर्य॑म् । चक्षुः॑ । ग॒च्छ॒तु॒ । वात॑म् । आ॒त्मा । द्याम् । च॒ । ग॒च्छ॒ । पृ॒थि॒वीम् । च॒ । धर्म॑णा । अ॒पः । वा॒ । ग॒च्छ॒ । यदि॑ । तत्र॑ । ते॒ । हि॒तम् । ओष॑धीषु । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒ । शरी॑रैः ॥ १०.१६.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:16» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चक्षुः सूर्यं गच्छतु-आत्मा वातं द्यां च पृथिवीं च धर्मणा गच्छ) नेत्रप्रकाश सूर्यप्रकाश को प्राप्त हो, जीवात्मा वायुमय अन्तरिक्ष को एवं पुनः प्रकाशयुक्त लोक को या पृथिवीलोक को अपने किये कर्म से प्राप्त हो (अपः-वा गच्छ यदि तत्र ते हितम्) जलमय लोक को जा, यदि तेरा वहाँ कर्मफल हो (शरीरैः-ओषधीषु प्रतितिष्ठ) शरीरधारणमात्र गुणों से ओषधियों में गमनाभावरूप स्थावरत्व जड़त्व को प्राप्त हो, यदि वहाँ तेरा कर्मफल हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - देहपात के अनन्तर देह तो अपने-अपने कारण पदार्थों में लीन हो जाता है और जीव स्वकर्मानुसार प्रकाशमय, जलमय, पृथिवीमय लोकों तथा वृक्षादि की जड़योनियों तक प्राप्त होता है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवों के साथ लाड़ाई का न होना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] कभी-कभी पिता पुत्र में भी संघर्ष हो जाता है, पुत्र अलग घर बना लेता है और उसका पितृगृह में आना जाना नहीं रहता । यहाँ 'सूर्य' पिता है तो शरीर में अक्षि में निवास करनेवाली चक्षु उसका पुत्र है। 'वात' पिता है, शरीरस्थ प्राण उसका पुत्र है। 'द्युलोक' पिता है, 'मस्तिष्क' पुत्र । 'पृथिवी' पिता है, 'शरीर' पुत्र। ' अन्तरिक्ष' पिता है, 'हृदय' पुत्र । इन से पिता पुत्रों का संघर्ष हो जाए तो सारा स्वास्थ्य ही समाप्त हो जाए । सो कहते हैं कि (चक्षुः) = तेरी आँख (सूर्यं गच्छतु) = सूर्य को जाये। सूर्य के यहां उसका आना-जाना बना रहे। सूर्य के साथ चक्षु का संघर्ष होते ही चक्षु विकृत हो जाती है, वैदिक संस्कृति में सूर्याभिमुख होकर ध्यान करने का विधान इस दृष्टिकोण से कितना महत्त्वपूर्ण है ? हम प्रभु का ध्यान करते हैं, और 'सूर्य' आँख को शक्ति देता है । [२] (आत्मा) = [ प्राणः सा० ] तेरा प्राण (वातम्) = वायु के प्रति जानेवाला हो। शुद्ध वायु में प्राणायाम के द्वारा कौन-सा दोष दूर नहीं किया जा सकता ? [३] इसी प्रकार (द्यां च गच्छ) = तू मस्तिष्क के दृष्टिकोण से द्युलोक को जा । तेरे मस्तिष्क व द्युलोक में अनुकूलता हो । द्युलोक के सूर्य व नक्षत्रों की तरह तेरे मस्तिष्क में भी ज्ञान-विज्ञान के सूर्य व नक्षत्र चमकें । [४] (पृथिवीं च) = तू शरीर से पृथिवी को जानेवाला बन । 'अखाड़े में लोटना-पोटना व शरीर पर भस्म रमाना' शारीरिक दोषों को दूर करता है । मट्टी की रोटी पेट पर रखने से ज्वर उतर जाता है। यही शरीर के विषों को खैंच लेती है । [५] (अपो वा गच्छ) = [आपः = अन्तरिक्ष] हृदय के दृष्टिकोण से तू अन्तरिक्ष को जानेवाला हो । जैसे 'अन्तरिक्ष' [अन्तरिक्ष] द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में है, इसी प्रकार तेरा हृदय सदा मध्यमार्ग का सेवन करनेवाला हो, वहाँ 'अकामता' न हो और 'कामात्मता' भी न हो जाए। [६] इस प्रकार सदा बना रहे । (धर्मणा) = शरीर के धारण के हेतु से यह आवश्यक है। जब देवों के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, तब शरीर का धारण न होकर शरीर भी गिर जाता है। सो (यदि) = यदि (तत्र) = वहां देवों में (ते हितम्) = तेरा स्थापन [ धा + क्त] होना है (शरीरैः) = इन स्थूल व सूक्ष्म शरीरों से तू (ओषधीषु प्रतितिष्ठा) = ओषधियों में प्रतिष्ठित हो । अर्थात् तू शरीरों के धारण के लिये ओषधियों, वानस्पतिक भोजनों का ही प्रयोग कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्य आदि देवों के साथ हमारी अनुकूलता बनी रहे । हम इसके लिये वानस्पतिक भोजनों का ही प्रयोग करें। देव वनस्पति का ही सेवन करते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चक्षुः सूर्यं गच्छतु-आत्मा वातं द्यां च पृथिवीं च धर्मणा गच्छ) चक्षुः-नेत्रं नेत्रप्रकाशः सूर्यम्-सूर्यप्रकाशं गच्छतु प्राप्नोतु, जीवो वातं जीवाधारं वायुं वाय्वालयं यमालयमन्तरिक्षं प्राप्नोतु। ‘एष वाय्वालय एव यमालयः’ “यमेन वायुना” इति प्रामाण्यात्। द्युलोकं प्रकाशयुक्तलोकं वा पृथिवीलोकं वा धर्मणा-स्वकृतकर्मणा गच्छ (अपः-वा गच्छ यदि तत्र ते हितम्) जलमयं लोकं वा गच्छ यदि तत्र-ते-तव हितं पथ्यं कर्मफलं स्यात् (शरीरैः-ओषधीषु प्रतितिष्ठ) शरीरधारणमात्रधर्मैरोषधीषु प्रतितिष्ठ गमनाभावेन स्थिरत्वं जडत्वं प्राप्नुहि यदि तत्र ते कर्मफलं स्यात् ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let the eye go the sun. Let the soul go to the wind or to the region of light or to the earth in consequence of its dharmic performance, or, if such be its interest and desire, let it go to the water or reach in herbs and trees there to stay in mere body form.