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यं कु॑मार॒ नवं॒ रथ॑मच॒क्रं मन॒साकृ॑णोः । एके॑षं वि॒श्वत॒: प्राञ्च॒मप॑श्य॒न्नधि॑ तिष्ठसि ॥

English Transliteration

yaṁ kumāra navaṁ ratham acakram manasākṛṇoḥ | ekeṣaṁ viśvataḥ prāñcam apaśyann adhi tiṣṭhasi ||

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Pad Path

यम् । कु॒मा॒र॒ । नव॑म् । रथ॑म् । अ॒च॒क्रम् । मन॑सा । अकृ॑णोः । एक॑ऽईषम् । वि॒श्वतः॑ । प्राञ्च॑म् । अप॑श्यन् । अधि॑ । ति॒ष्ठ॒सि॒ ॥ १०.१३५.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:135» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:23» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमार) कुत्सित मार मृत्यु जिसके लिए कहना है, वह सदा न मरनेवाला आत्मा (यं नवं रथम्) जिस नये शरीररथ (अचक्रम्) चक्ररहित को (मनसा-अकृणोः) मन से प्राप्त करता है अर्थात् मानसिक कर्म संस्कारों से निष्पन्न करता है (एकेषम्) एक गति भोगप्रवृत्ति जिसकी है, ऐसे को (विश्वतः प्राञ्चम्) सब ओर से प्रगतिवाले मनुष्य पशु पक्षी योनियों में होनेवाले (अपश्यन्-अधि तिष्ठसि) न जानता हुआ अधिष्ठित होता है-विराजता है ॥३॥
Connotation: - आत्मा अमर है, तो भी अज्ञानवश शरीर के बन्धन में आता है, जो शरीर नया-नया धारण करना पड़ता है, जिसकी गतिभोग प्रवृत्ति ही है, उस पर यह अधिष्ठित हुआ अपने को भूला हुआ शरीर को समझ कर व्यवहार करता है, यह सामान्य जन की स्थिति है ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

एकाग्रवृत्ति से रथ पर आरूढ़ होना

Word-Meaning: - [१] हे (कुमार) = कुत्सितता का विनाश करनेवाले ! (यम्) = जिस (नवम्) इन्द्रियरूपी नौ द्वारोंवाले, स्तुत्य [ नु स्तुतौ ] व गतिशील [नव गतौ] (रथम्) = शरीररूप रथ को, (अचक्रम्) = जिसमें अन्य रथों की तरह चक्र नहीं लगे हुए, अथवा 'अष्ट चक्रा' अचक्रा, जैसे 'याचामि' यामि । यह अष्टचक्रोंवाला है [अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या] (मनसा) = मन के साथ (अकृणोः) = करता है, अर्थात् जब तू बुद्धि को इस रथ का सारथि बनाता है। [२] तो उस समय इस एक (ईषम्) = एक प्राणरूप ईषावाले, अग्रदण्डवाले (विश्वतः प्राञ्चम्) = सब ओर आगे बढ़नेवाले इस रथ पर तू (अपश्यन्) = इधर- उधर न देखता हुआ, इधर-उधर के सौन्दर्य से आकृष्ट न होता हुआ अधितिष्ठसि अधिष्ठित होता है । इधर-उधर ध्यान गया तो रथ का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना सम्भावित ही है। यह शरीर- रथ तो हमें लक्ष्य-स्थान पर तभी पहुँचायेगा जब कि हम विषयाकृष्ट न होते हुए एकाग्रवृत्ति से इस पर आरूढ़ होंगे।
Connotation: - भावार्थ-यह शरीर-रथ अद्भुत रथ है। यह 'नव, अचक्र, एकेष व विश्वतः प्राङ् है । इसका अधिष्ठाता तो वही बनता है जो इधर-उधर न झाँकता रहे ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमार) कुत्सितो मारो मृत्युर्यस्य सः-आत्मा तत्सम्बुद्धौ हे आत्मन् ! (यं नवं रथम्-अचक्रं-मनसा-अकृणोः) यं नवीनं देहरथं चक्ररहितं स्वयं गमनशीलं त्वं मनसा प्राप्नोषि “मनोऽधिकृतेनायात्यस्मिन्-शरीरे” [प्रश्नो०] (एकेषम्) एका-ईषा गतिर्यस्य तम्, भोगप्रवृत्तिकं (विश्वतः प्राञ्चम्) सर्वतः प्रगतिकं मनुष्यपशुपक्षियोनिषु गच्छन्तम् (अपश्यन्-अधि तिष्ठसि) अजानन् विराजसे ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O soul, dear child, without seeing, without knowing, you ride a new chariot, of the body, which you have yourself caused to have been created, by your own mind. It goes round and round all round in various forms of life and states of existence without wheels and by only one pole of desire and energy.