एकाग्रवृत्ति से रथ पर आरूढ़ होना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कुमार) = कुत्सितता का विनाश करनेवाले ! (यम्) = जिस (नवम्) इन्द्रियरूपी नौ द्वारोंवाले, स्तुत्य [ नु स्तुतौ ] व गतिशील [नव गतौ] (रथम्) = शरीररूप रथ को, (अचक्रम्) = जिसमें अन्य रथों की तरह चक्र नहीं लगे हुए, अथवा 'अष्ट चक्रा' अचक्रा, जैसे 'याचामि' यामि । यह अष्टचक्रोंवाला है [अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या] (मनसा) = मन के साथ (अकृणोः) = करता है, अर्थात् जब तू बुद्धि को इस रथ का सारथि बनाता है। [२] तो उस समय इस एक (ईषम्) = एक प्राणरूप ईषावाले, अग्रदण्डवाले (विश्वतः प्राञ्चम्) = सब ओर आगे बढ़नेवाले इस रथ पर तू (अपश्यन्) = इधर- उधर न देखता हुआ, इधर-उधर के सौन्दर्य से आकृष्ट न होता हुआ अधितिष्ठसि अधिष्ठित होता है । इधर-उधर ध्यान गया तो रथ का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना सम्भावित ही है। यह शरीर- रथ तो हमें लक्ष्य-स्थान पर तभी पहुँचायेगा जब कि हम विषयाकृष्ट न होते हुए एकाग्रवृत्ति से इस पर आरूढ़ होंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यह शरीर-रथ अद्भुत रथ है। यह 'नव, अचक्र, एकेष व विश्वतः प्राङ् है । इसका अधिष्ठाता तो वही बनता है जो इधर-उधर न झाँकता रहे ।