Word-Meaning: - [१] (त्वम्) = हे प्रभो! आप (दूतः) = मुझे ज्ञान का सन्देश प्राप्त करानेवाले हैं। (प्रथमः) = सर्वमुख्य व सर्वव्यापक हैं। (वरेण्यः) = वरण करने के योग्य हैं, आपका वरण करनेवाला ही जीवन में सुखी होता है । (सः) = वे (अमृताय) = अमृतत्व की प्राप्ति के लिए (हूयमानः) = पुकारे जाते हुए आप (मत्स्व) = [to satisfy] हमें तृप्त व आनन्दित कीजिए। हमारी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आप हमारे हर्ष का कारण होइये । [२] (मरुतः) = प्राणसाधना करनेवाले पुरुष ही (त्वाम्) = आपको (मर्जयन्) = अपने अन्दर शोधित करते हैं। वासनाओं का आवरण हमारे अन्दर प्रभु के प्रकाश को आवृत किये रहता है। इस आवरण को हटाना ही 'प्रभु के प्रकाश का शोधन' है। यह आवरण का हटाना प्राणसाधना के द्वारा ही सम्भव है। [३] (दाशुषः गृहे) = दान की वृत्तिवाले के गृह में (भृगवः) = ज्ञानी लोग, ज्ञान द्वारा अपना परिपाक करनेवाले लोग, (त्वाम्) = आपको (स्तोमेभिः) = स्तुतियों के द्वारा (वि रुरुचुः) = दीप्त करते हैं। जो भोग-प्रवण व्यक्ति नहीं, उस व्यक्ति के घर में सत्संग के लिए लोग एकत्रित होते हैं। वहाँ ज्ञानी पुरुष प्रभु का गायन करते हैं। सारा वातावरण प्रभु की भावना से ओत-प्रोत हो उठता है, सभी के हृदयों में प्रभु का स्मरण होता है। यही प्रभु का दीपन है ।
Connotation: - भावार्थ - हम प्रभु से अमृतत्व के लिए प्रार्थना करें। वासनाओं के आवरण को दूर करके प्रभु के प्रकाश को देखें। घरों में एकत्रित होकर प्रभु का गायन करें।