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तं वो॒ विं न द्रु॒षदं॑ दे॒वमन्ध॑स॒ इन्दुं॒ प्रोथ॑न्तं प्र॒वप॑न्तमर्ण॒वम् । आ॒सा वह्निं॒ न शो॒चिषा॑ विर॒प्शिनं॒ महि॑व्रतं॒ न स॒रज॑न्त॒मध्व॑नः ॥

English Transliteration

taṁ vo viṁ na druṣadaṁ devam andhasa indum prothantam pravapantam arṇavam | āsā vahniṁ na śociṣā virapśinam mahivrataṁ na sarajantam adhvanaḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

तम् । वः॒ । विम् । न । द्रु॒ऽसद॑म् । दे॒वम् । अन्ध॑सः । इन्दु॑म् । प्रोथ॑न्तम् । प्र॒ऽवप॑न्तम् । अ॒र्ण॒वम् । आ॒सा । वह्नि॑म् । न । शो॒चिषा॑ । वि॒ऽर॒प्शिन॑म् । महि॑ऽव्रतम् । न । स॒रज॑न्तम् । अध्व॑नः ॥ १०.११५.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:115» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:6» Varga:18» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वः) हे मनुष्यों ! तुम (तं देवम्) उस परमात्मदेव (अन्धसः-इन्दुम्) आध्यानीय स्नेहकर्त्ता (प्रोथन्तम्) प्राप्त होते हुए (प्रवपन्तम्) ज्ञानबीज बोते हुए (अर्णवम्) समुद्र के समान महान् (विं न द्रुषदम्) वृक्ष पर बैठनेवाले पक्षी के समान, संसारवृक्ष पर विराजमान परमात्मा को स्तुति में लाओ (आसा) भलीभाँति फेंकने के साधन (शोचिषा) तेज से (विरप्शिनम्) महान् (महिव्रतम्) महाकर्मवाले (अध्वनः-सरजन्तम्) मोक्षमार्ग के स्रष्टा (वह्निम्) संसार के वहन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करो ॥३॥
Connotation: - मनुष्यों को चाहिये कि स्नेहकर्त्ता व्यापक ज्ञान के बीज को देनेवाले संसार के अधिष्ठाता मोक्षमार्ग के सृजन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करें ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मार्गदर्शक प्रभु

Word-Meaning: - [१] (तम्) = उस प्रभु को उपासित करो जो (वः) = तुम्हारे (विं न) = पक्षी के समान (द्रुषदम्) = शरीररूप वृक्ष पर आसीन होनेवाले हैं। (देवम्) = प्रकाशमय है, (अन्धसः इन्दुम्) = सोम के द्वारा हमें शक्तिशाली बनानेवाले हैं। (प्रोथन्तम्) = हमारे सब अन्तः शत्रुओं को जो पराभूत करनेवाले हैं [to sabdne]। वासनाओं को पराभूत करके (प्रवपन्तम्) = जो सद्गुणों के बीजों को बोनेवाले हैं। (अर्णवम्) = ज्ञान समुद्र हैं । [२] उस प्रभु का उपासन करो जो प्रभु (आसा वह्निं न) = मुख से अग्नि के समान हैं, अत्यन्त तेजस्वी हैं। (शोचिषा) = अपनी ज्ञानदीप्ति से (विरप्शिनम्) = महान् हैं । और (महिव्रतं न) = इस महान् व्रतवाले सूर्य की तरह (अध्वनः) = मार्गों को (स-रजन्तम्) = [सह रंजयन्तम्] एक साथ दीप्त करते हुए हैं। सूर्य अन्धकार को दूर करके बाह्य मार्गों को प्रकाशित करता है। इसी प्रकार हृदयस्थ प्रभु अज्ञानान्धकार को दूर करके हमारे कर्त्तव्य मार्गों को प्रदर्शित करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम उस प्रभु का उपासन करें जो हमारे हृदयों में आसीन हैं, प्रकाशमय हैं, हमारी बुराइयों को दूर करके अच्छाइयों के बीज को हमारे में बोनेवाले हैं, और सूर्य के समान मार्गदर्शक हैं।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वः) हे मनुष्याः ! यूयम्, व्यत्ययेन द्वितीया (तं देवम्-अन्धसः-इन्दुम्) तं परमात्मदेवम् आध्यानीयं स्नेहसेक्तारं “इन्दुरिन्धतेः” (प्रोथन्तम्) पर्याप्नुवन्तं (प्रवपन्तम्) ज्ञानबीजं वपन्तं (अर्णवम्) समुद्रमिव महान्तं (विं न द्रुषदम्) वृक्षसदं पक्षीव संसारवृक्षसदं तं परमात्मानं स्तुवीध्वमिति शेषः (आसा) समन्तक्षेपणेन “आङ्पूर्वात् असु क्षेपणे” ततः क्विप् (शोचिषा) तेजसा (विरप्शिनम्) महान्तं (महिव्रतम्) महाकर्माणं (अध्वनः सरजन्तम्) मोक्षमार्गस्य स्रष्ट्रारं (वह्निम्) संसारस्य वोढारं परमात्मानं स्तुवीध्वम्, उभयत्र नकारौ पदपूरणौ ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O celebrants of yajna, celebrate Agni, the leader, watching every thing like a bird on the tree, abiding in every thing dynamic, brilliant and generous, profuse giver of food and joy, thundering as a cloud of living showers and deep as the sea, consumer of havi by flames of fire and giver of light by sun rays, mighty strong and exalted, grand achiever of victories and pioneer path maker and illuminator like the sun.