'ये सब लोक प्रभु की महिमा के व्यञ्जक हैं'
Word-Meaning: - [१] सब लोकों से पुनरावृत्त होना पड़ता है। ये सात 'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्' उत्तम लोक हैं और इसी प्रकार सात 'असुर्यानाम ते लोकाः अन्धेनतमसावृताः 'अन्धतमस से आवृत असुर्यलोक हैं- 'तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल' (अन्ये) = दूसरे (चतुर्दश) = उल्लिखित चौदह लोक (अस्य महिमानः) = इस प्रभु की महिमा हैं। ये सब लोक प्रभु की महिमा को व्यक्त कर रहे हैं। (तम्) = उस प्रभु को (सप्त धीराः) = [ धियं रान्ति] सात ज्ञान के देनेवाले व [धियिरमते] ज्ञान में रमण करनेवाले धीर पुरुष (वाचा) = स्तुति वाणियों के द्वारा (प्रणयन्ति) = प्राप्त कराते हैं । 'महर्षया सप्त पूर्वे चत्वारः मनवस्तथा' इस वाक्य के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु के मानस पुत्रों में ये सात महर्षि हैं- 'मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ'। ये सात ‘अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' से ज्ञान प्राप्त करके अन्य मनुष्यों के लिए ज्ञान को देनेवाले होते हैं। [२] (इह) = यहाँ इस सृष्टि में (कः) = वे आनन्दस्वरूप प्रभु ही अथवा अनिरुक्त प्रजापति ही (आप्नानम्) = प्रभु प्राप्ति के साधनभूत (तीर्थम्) = [means] उपाय को (प्रवोचत्) = वेद में प्रतिपादित करते हैं (येन पथा) = जिस मार्ग से (सुतस्य) = शरीर में उत्पन्न हुए हुए सोम का प्रपिबन्ते पान करते हैं । वस्तुतः सोमपान के होने पर ही प्रभु की प्राप्ति का सम्भव होता है । वेद इस सोम के पान के लिए उपाय व मार्ग का संकेत करता है। इस मार्ग से चलकर मनुष्य प्रभु का दर्शन करनेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ-वेद में उस मार्ग का प्रभु ने प्रतिपादन किया है जिससे चलकर मनुष्य सोम का पान करनेवाला बनता है। इस सोमपान से तीव्रबुद्धि होकर मनुष्य सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है।