वांछित मन्त्र चुनें
437 बार पढ़ा गया

चतु॑र्दशा॒न्ये म॑हि॒मानो॑ अस्य॒ तं धीरा॑ वा॒चा प्र ण॑यन्ति स॒प्त । आप्ना॑नं ती॒र्थं क इ॒ह प्र वो॑च॒द्येन॑ प॒था प्र॒पिब॑न्ते सु॒तस्य॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

caturdaśānye mahimāno asya taṁ dhīrā vācā pra ṇayanti sapta | āpnānaṁ tīrthaṁ ka iha pra vocad yena pathā prapibante sutasya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

चतुः॑ऽदश । अ॒न्ये । म॒हि॒मानः॑ । अ॒स्य॒ । तम् । धीराः॑ । वा॒चा । प्र । न॒य॒न्ति॒ । स॒प्त । आप्ना॑नम् । ती॒र्थम् । कः । इ॒ह । प्र । वो॒च॒त् । येन॑ । प॒था । प्र॒ऽपिब॑न्ते । सु॒तस्य॑ ॥ १०.११४.७

437 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:114» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस सोम-शान्तस्वरूप परमात्मा के (अन्ये चतुर्दश) अन्य चौदह (महिमानः) महिमारूप भुवन-लोकभूमियाँ भूः, भुवः, स्वः आदि सात शरीर में तथा संसार में सात ऐसे चौदह परमात्मा की महिमारूप हैं, (धीराः) बुद्धिमान् ध्यानी योगीजन (वाचा) वाणी से (तम्) उस परमात्मा को (सप्त प्र नयन्ति) सात-सात महिमाओं को प्रकृष्टरूप में अपने अन्दर बिठाते हैं (आप्नानम्) उस व्याप्त होते हुए (तीर्थम्) संसारसागर से तरानेवाले को (कः) कौन-कोई विरला (इह) इस संसार में (प्र वोचत्) कहे-उसका प्रवचन करे (येन पथा) जिस मार्ग से (सुतस्य) सम्पादित-निष्पादित आनन्दरस के उपासक (प्रपिबन्ते) प्रकृष्टरूप में पान करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - भूः, भुवः आदि प्राणकेन्द्र शरीर के सात हैं, जो प्राणायामवाले मन्त्र में कहे गये हैं तथा सात लोकस्तर भूः, भुवः आदि संसार में हैं। ये दोनों चौदह उसकी महिमारूप हैं, इनके द्वारा बुद्धिमान् ध्यानी योगीजन उस परमात्मा को अपने अन्दर बिठाते हैं, वह संसारसागर से तरानेवाला है, उपासकजन उसका आनन्दरसपान करते हैं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ये सब लोक प्रभु की महिमा के व्यञ्जक हैं'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] सब लोकों से पुनरावृत्त होना पड़ता है। ये सात 'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्' उत्तम लोक हैं और इसी प्रकार सात 'असुर्यानाम ते लोकाः अन्धेनतमसावृताः 'अन्धतमस से आवृत असुर्यलोक हैं- 'तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल' (अन्ये) = दूसरे (चतुर्दश) = उल्लिखित चौदह लोक (अस्य महिमानः) = इस प्रभु की महिमा हैं। ये सब लोक प्रभु की महिमा को व्यक्त कर रहे हैं। (तम्) = उस प्रभु को (सप्त धीराः) = [ धियं रान्ति] सात ज्ञान के देनेवाले व [धियिरमते] ज्ञान में रमण करनेवाले धीर पुरुष (वाचा) = स्तुति वाणियों के द्वारा (प्रणयन्ति) = प्राप्त कराते हैं । 'महर्षया सप्त पूर्वे चत्वारः मनवस्तथा' इस वाक्य के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु के मानस पुत्रों में ये सात महर्षि हैं- 'मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ'। ये सात ‘अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' से ज्ञान प्राप्त करके अन्य मनुष्यों के लिए ज्ञान को देनेवाले होते हैं। [२] (इह) = यहाँ इस सृष्टि में (कः) = वे आनन्दस्वरूप प्रभु ही अथवा अनिरुक्त प्रजापति ही (आप्नानम्) = प्रभु प्राप्ति के साधनभूत (तीर्थम्) = [means] उपाय को (प्रवोचत्) = वेद में प्रतिपादित करते हैं (येन पथा) = जिस मार्ग से (सुतस्य) = शरीर में उत्पन्न हुए हुए सोम का प्रपिबन्ते पान करते हैं । वस्तुतः सोमपान के होने पर ही प्रभु की प्राप्ति का सम्भव होता है । वेद इस सोम के पान के लिए उपाय व मार्ग का संकेत करता है। इस मार्ग से चलकर मनुष्य प्रभु का दर्शन करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वेद में उस मार्ग का प्रभु ने प्रतिपादन किया है जिससे चलकर मनुष्य सोम का पान करनेवाला बनता है। इस सोमपान से तीव्रबुद्धि होकर मनुष्य सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य चतुर्दशः-महिमानः) एतस्य सोमस्य शान्तरसरूपस्य परमात्मनः-अन्ये चतुर्दशभुवनानि भूर्भुवःप्रभृतयो शरीरे तथा संसारे च सहैव सर्वे चतुर्दश परमात्मनो महिमारूपाः सन्ति (धीराः-वाचा तं सप्त प्र नयन्ति) धीमन्तो ध्यायिनो योगिनः वाचा तं सोमं परमात्मानं सप्त सप्त महिम्नः प्रति प्रकृष्टं नयन्ति तत्र सेवन्ते (आप्नानं तीर्थं कः-इह प्र वोचेत्) तं व्याप्नुवन्तं संसारसागरात् तारकमत्र कः-कश्चन विरल एव प्रवदेत् (येन पथा सुतस्य प्रपिबन्ते) येन मार्गेण-निष्पादितस्यानन्दरसस्य-उपासकाः प्रकृष्टं पानं कुर्वन्ति ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Fourteen are other majestic manifestations of this soma spirit of the universe in dynamic yajnic form which seven grand sages conduct with the voice divine. And here, in this world of limited human imagination, who can explain and reveal in human terms that all- pervasive saviour spirit in its reality and that central path by which the sages move up to divinity and have a drink of the soma ecstasy of divinity distilled through experience?