Word-Meaning: - [१] (आयोः सचा) = मनुष्य का सहायभूत औरों के साथ मिलकर चलनेवाला, (इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (आचकृषे) = सब कार्यों का करनेवाला होता है । इसके कार्य औरों के विरोध में नहीं होते। (उपानसः) = [अन: उपगतवान्] यह आरुढ़स्थ होता है, शरीररूप रथ का अधिष्ठाता बनता है । (सपर्यन्) = प्रभु की पूजा करनेवाला होता है । वस्तुतः औरों के अविरोध से सतत कार्यों में लगे रहने से ही यह प्रभु का उपासन करता है । [२] (विव्रतयोः) = विविध व्रतोंवाले, भिन्न-भिन्न कार्यों को करनेवाले (नदयोः) = कार्यों के द्वारा प्रभु का स्तवन करनेवाले इन्द्रियाश्वों के (शूरः) = [शृ हिंसायाम्] सब दोषों को नष्ट करनेवाला यह (इन्द्रः) = सचमुच इन्द्रियों का अधिष्ठाता होता है ।
Connotation: - भावार्थ - इन्द्र वह है [क] जो औरों से मिलकर चलता है, [ख] कर्मों में लगा रहता है, [ग] शरीर रथ का अधिष्ठाता होता है, [घ] प्रभु की पूजा करता है, [ङ] इन्द्रिय दोषों को दूर करता है, इसके इन्द्रियाश्व अपने-अपने कार्यों के द्वारा प्रभु-स्तवन करनेवाले होते हैं।