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असा॑वि॒ सोम॑: पुरुहूत॒ तुभ्यं॒ हरि॑भ्यां य॒ज्ञमुप॑ याहि॒ तूय॑म् । तुभ्यं॒ गिरो॒ विप्र॑वीरा इया॒ना द॑धन्वि॒र इ॑न्द्र॒ पिबा॑ सु॒तस्य॑ ॥

English Transliteration

asāvi somaḥ puruhūta tubhyaṁ haribhyāṁ yajñam upa yāhi tūyam | tubhyaṁ giro vipravīrā iyānā dadhanvira indra pibā sutasya ||

Pad Path

असा॑वि । सोमः॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । तुभ्य॑म् । हरि॑ऽभ्याम् । य॒ज्ञम् । उप॑ । या॒हि॒ । तूय॑म् । तुभ्य॑म् । गिरः॑ । विप्र॑ऽवीराः । इ॒या॒नाः । द॒ध॒न्वि॒रे । इ॒न्द्र॒ । पिब॑ । सु॒तस्य॑ ॥ १०.१०४.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:104» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:24» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:9» Mantra:1


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BRAHMAMUNI

इस सूक्त में परमात्मा अपने उपासकों के दुःख दूर करता है, मृत्यु तक से पार करता है, उन्हें अपने आनन्द से तृप्त करता है, उसकी श्रद्धा से स्तुति प्रार्थना उपासना करनी चाहिये इत्यादि विषय वर्णित हैं।

Word-Meaning: - (पुरुहूत-इन्द्र) हे बहुत प्रकारों से बुलाने योग्य या बहुत बुलाने योग्य ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (तुभ्यम्) तेरे लिए (सोमः) हमारे द्वारा उपासनारस (असावि) सम्पादित किया है (यज्ञम्) हमारे अध्यात्मयज्ञ के प्रति (हरिभ्याम्) दुःख हरण करनेवाले कृपाप्रसाद के साथ (तूयम्) शीघ्र (उप याहि) प्राप्त हो (तुभ्यम्) तेरे लिये (विप्रवीराः) मेधावी प्रेरक (गिरः) स्तुतियों को (इयानाः) गमनशील (दधन्विरे) प्रेरित करते हैं (सुतस्य) निष्पादित उपासनारस को (पिब) स्वीकार कर ॥१॥    
Connotation: - जो परमात्मा की उपासना करता है या परमात्मा के लिये उपासनारस समर्पित करता है, परमात्मा अपने कृपाप्रसाद के द्वारा उसका दुःख हरण करता हुआ प्राप्त होता है तथा उसके लिये जो स्तुति करते हैं, वह स्वीकार करता है ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोम का उत्पादन व रक्षण

Word-Meaning: - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो! (तुभ्यम्) = आपकी प्राप्ति के लिए (सोमः) = सोम (असावि) = उत्पन्न किया गया है। इस सोम के रक्षण से ज्ञानाग्नि की दीप्ति के द्वारा आपका दर्शन होता है। वस्तुतः सोमरक्षण का सब से बड़ा लाभ यही है कि यह प्रभु प्राप्ति का साधन बनता है । [२] हे प्रभो ! आप (हरिभ्याम्) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों के साथ (यज्ञम्) = हमारे जीवनयज्ञ को उपयाहि समीपता से प्राप्त होइये। हमें उत्तम ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ प्राप्त हों। इनके द्वारा ही तो हम इस जीवनयज्ञ को पूर्ण कर सकेंगे। [३] (तुभ्यम्) = आपके प्राप्ति के लिए ही (विप्रवीराः) = [विप्राः वीराः विशेषेण ईरयितारः या सा] ज्ञानी पुरुषों से विशेषरूप से प्रेरित की जानेवाली (इयानाः) = गमनशील क्रियाओं से युक्त (गिरः) = स्तुति वाणियाँ (दधन्विरे) = धारण की जाती हैं। ज्ञानी पुरुष प्रभु का स्तवन करते हैं, उन स्तुति वाणियों के अनुसार क्रियाशील होते हैं । यह क्रियामय स्तुति ही प्रभु प्राप्ति का साधन बनती है । [४] (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (सुतस्य) = इस उत्पन्न हुए हुए सोम का (पिबा) = पान करिये। आपके स्तवन से ही वासनाओं का विनाश होता है और तभी सोम के रक्षण का सम्भव होता है ।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में उत्पन्न सोमशक्ति के रक्षण से प्रभु प्राप्ति का सम्भव होता है। यह रक्षण भी प्रभु - स्तवन के द्वारा ही होता है। इसके रक्षण से इन्द्रियों की शक्ति का वर्धन होता है और जीवन-यज्ञ सुन्दरता से पूर्ण होता है ।
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BRAHMAMUNI

अस्मिन् सूक्ते परमात्मा स्वोपासकानां दुःखानि दूरीकरोति मृत्युतश्च पारयति स्वानन्देन तान् तर्पयति तस्य श्रद्धया स्तुतिप्रार्थनोपासनाः कार्या इत्येवमादयो विषया वर्ण्यन्ते।

Word-Meaning: - (पुरुहूत-इन्द्र) हे बहुभिः प्रकारैः-ह्वातव्य, यद्वा बहुह्वातव्य ! ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (तुभ्यं सोमः-असावि) तुभ्यमस्माभि-रुपासनारसः “रसः सोमः” [श० ७।३।१।३] सम्पादितः (यज्ञं हरिभ्यां तूयम्-उप याहि) अस्माकमध्यात्मयज्ञं दुःखहरणाभ्यां कृपाप्रसादाभ्यां सह शीघ्रमुपागतो भव (तुभ्यं विप्रवीराः-गिरः-इयाना-दधन्विरे) तुभ्यं मेधावि प्रेरयितारः-त्वां प्रति स्तुतिः-गमनशीलाः “ईङ् गतौ” ताच्छीलिकः चानश् प्रत्ययः “ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्” [अष्टा० ३।२।१२९] त्वां प्रति गमयन्ति “धवि गत्यर्थः” [भ्वादि०] (सुतस्य पिब) सुतं निष्पादितमुपासनारसम् “ द्वितीयास्थाने षष्ठी व्यत्ययेन” स्वीकुरु “न घा त्वद्रिगप वेति मे मनस्त्वे इत्कामं पुरुहूत शिश्रय। राजेव दस्म निषदोऽधि बर्हिष्यस्मिन्त्सु सोमेऽवपानमस्तुते” [ऋ० १०।४३।२] यथाऽत्र सोमपानमिन्द्राय परमात्मने प्रस्तूयते तद्वत् प्रस्तुतमन्त्रेऽपि ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, omnipotent ruler of the world, lord invoked by all people, our soma of love and adoration is prepared and seasoned for you, come soon to our yajna by the radiations of your refulgent presence. Vibrant poets and sages have prepared songs of adoration for you. Pray come, accept and enjoy our homage, and protect and promote this world of your own creation for us.