Word-Meaning: - [१] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् (इन्द्र) = शत्रु विनाशक प्रभो! (जिघांसतः) = हमारे हनन की कामना करते हुए (अभिदासतः) = [ दसु उपक्षये] हमारा (उपक्षय) = विनाश करनेवाले वासनारूप शत्रु के (वज्रम्) = वज्र को (अन्तः यच्छ) = बीच में ही रोकनेवाले होइये । इस शत्रु का हमारे पर आक्रमण न हो पाये। [२] (दासस्य वा) = चाहे हमें नष्ट करनेवाले दास का (वधम्) = हनन साधन आयुध हो (वा) = अथवा (आर्यस्य) = श्रेष्ठ का (सनुतः) = अन्तर्हित रूप में प्रभुज्यमान आयुध हो उसे (यवय) = हमारे से पृथक् करिये। 'तमस् व रजस्' यदि दास हैं तो 'सत्त्व' आर्य है । 'तमस्' प्रमाद, आलस्य व निद्रा के द्वारा आक्रमण करता है और रजस्, लोभ व तृष्णा के द्वारा आक्रमण करता है । सत्त्वगुण भी ज्ञान व सुख के द्वारा हमें बाँधता है। प्रभु की कृपा से हम इन सब बन्धनों से ऊपर उठें, त्रिगुणातीत बनें। रजस् व तमस् से ऊपर उठने के लिए सत्त्व को अपनाएँ और इस प्रकार नित्य सत्त्वस्थ होकर अन्ततः सत्त्वगुण से भी ऊपर उठें।
Connotation: - भावार्थ- हम दासरूप तमस् व रजस् के तथा आर्यरूप सत्व के बन्धन से ऊपर उठें।