Word-Meaning: - [१] (व्रजं कृणुध्वम्) = बाड़े को बनाओ। जैसे बाड़े में गौवों को निरुद्ध करते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियरूप गौवों को इस बाड़े में निरुद्ध करने का प्रयत्न करो । प्रभु नाम-स्मरण से हृदय वह 'व्रज' बन जाता है जिसमें कि मन व इन्द्रियें निरुद्ध रहती हैं । (सः) = वह व्रज (हि) = ही (वः) = तुम (नृपाणः) = प्रणतिशील व्यक्तियों का रक्षक है । [२] (बहुला) = अनेक (पृथूनि) = विस्तीर्ण (वर्म) = कवचों को (सीव्यध्वम्) = सींओ । ये कवच तुम्हारा रक्षण करनेवाले हों । 'ब्रह्म वर्म मनान्तरम्' = वस्तुतः ब्रह्म ही हमारा आन्तर (वर्म) = कवच है। ये कवच हमारे सब कोशों का रक्षण करते हैं। इन कवचों से रक्षित होकर हमारे ये कोश 'तेज, वीर्य, बल, ओज, मन्यु व सहस्' से परिपूर्ण होते हैं । [३] इस प्रकार कवचों से अपने को सुरक्षित करके (पुरः) = इन शरीररूप पुरियों को (आयसी:) = लोहमयी, अर्थात् दृढ और (अधृष्टाः) = रोगादि से अधर्षणीय (कृणुध्वम्) = करो । (वः) = तुम्हारा सोम का, वीर्य का (चमसा) = आधारभूत यह शरीररूप पात्र (मा सुस्रोत्) = चूनेवाला न हो । सोम इसके अन्दर सुरक्षित रहे । (तम्) = उस पात्र को (दृंहता) = दृढ़ बनाओ । वीर्य-रक्षण से ही तो इसने दृढ़ बनना है।
Connotation: - भावार्थ - हम इन्द्रियों को निरुद्ध करें। प्रभु नामस्मरण को अपना कवच बनाएँ । हमारे शरीर लोहवत् दृढ़ हों। सोम का रक्षण करें।