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व्र॒जं कृ॑णुध्वं॒ स हि वो॑ नृ॒पाणो॒ वर्म॑ सीव्यध्वं बहु॒ला पृ॒थूनि॑ । पुर॑: कृणुध्व॒माय॑सी॒रधृ॑ष्टा॒ मा व॑: सुस्रोच्चम॒सो दृंह॑ता॒ तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vrajaṁ kṛṇudhvaṁ sa hi vo nṛpāṇo varma sīvyadhvam bahulā pṛthūni | puraḥ kṛṇudhvam āyasīr adhṛṣṭā mā vaḥ susroc camaso dṛṁhatā tam ||

पद पाठ

व्र॒जम् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । सः । हि । वः॒ । नृ॒ऽपानः॑ । वर्म॑ । सी॒व्य॒ध्व॒म् । ब॒हु॒ला । पृ॒थूनि॑ । पुरः॑ । कृ॒णु॒ध्व॒म् । आय॑सीः । अधृ॑ष्टाः । मा । वः॒ । सु॒स्रो॒त् । च॒म॒सः । दृंह॑त । तम् ॥ १०.१०१.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (व्रजम्) हे मनुष्यों ! देश को (कृणुध्वम्) बनाओ-बसाओ-सम्पन्न बनाओ (सः-हि वः) वही तुम्हारा (नृपाणः) मनुष्यों का रक्षक है (बहुला पृथूनि) बहुत महान् विशाल (वर्म सीव्यध्वम्) कवच वस्तुओं को सीवो-तथा प्रकोटे रचो (आयसीः) लोहमय दृढ़ (अधृष्टाः) अबाध्य (पुरः) नगरों को (कृणुध्वम्) करो (वः) तुम्हारा (चमसः) भोजनागार तथा अन्नभण्डार (मा सुस्रोत्) कभी स्रवित न हो-रिक्त न हो (तं दृंहत) उसे दृढ़ करो ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को मिलकर देश बसाना और उन्नत बनाना चाहिये। उसके चारों ओर प्रकोटे बनाना तथा उसमें नगरों को बसाना और वस्तुओं का निर्माण करना, भोजनागार तथा अन्नभण्डार भी दृढरूप में बनाना रखना चाहिये ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आयसी पूः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (व्रजं कृणुध्वम्) = बाड़े को बनाओ। जैसे बाड़े में गौवों को निरुद्ध करते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियरूप गौवों को इस बाड़े में निरुद्ध करने का प्रयत्न करो । प्रभु नाम-स्मरण से हृदय वह 'व्रज' बन जाता है जिसमें कि मन व इन्द्रियें निरुद्ध रहती हैं । (सः) = वह व्रज (हि) = ही (वः) = तुम (नृपाणः) = प्रणतिशील व्यक्तियों का रक्षक है । [२] (बहुला) = अनेक (पृथूनि) = विस्तीर्ण (वर्म) = कवचों को (सीव्यध्वम्) = सींओ । ये कवच तुम्हारा रक्षण करनेवाले हों । 'ब्रह्म वर्म मनान्तरम्' = वस्तुतः ब्रह्म ही हमारा आन्तर (वर्म) = कवच है। ये कवच हमारे सब कोशों का रक्षण करते हैं। इन कवचों से रक्षित होकर हमारे ये कोश 'तेज, वीर्य, बल, ओज, मन्यु व सहस्' से परिपूर्ण होते हैं । [३] इस प्रकार कवचों से अपने को सुरक्षित करके (पुरः) = इन शरीररूप पुरियों को (आयसी:) = लोहमयी, अर्थात् दृढ और (अधृष्टाः) = रोगादि से अधर्षणीय (कृणुध्वम्) = करो । (वः) = तुम्हारा सोम का, वीर्य का (चमसा) = आधारभूत यह शरीररूप पात्र (मा सुस्रोत्) = चूनेवाला न हो । सोम इसके अन्दर सुरक्षित रहे । (तम्) = उस पात्र को (दृंहता) = दृढ़ बनाओ । वीर्य-रक्षण से ही तो इसने दृढ़ बनना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम इन्द्रियों को निरुद्ध करें। प्रभु नामस्मरण को अपना कवच बनाएँ । हमारे शरीर लोहवत् दृढ़ हों। सोम का रक्षण करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (व्रजं कृणुध्वम्) देशम् “व्रजं प्राप्तं देशम्” [ऋ० १।१५६।४ दयानन्दः] कुरुत (सः-हि वः-नृपाणः) स खलु युष्माकं नराणां रक्षकः (बहुला पृथूनि) बहूनि महान्ति विशालानि (वर्म सीव्यध्वम्) वर्माणि-कवचवस्त्राणि रचयत “सीव्यन् रचयन्” [ऋ० २।१७।७ दयानन्दः] (आयसीः) लोहमयानि-दृढानि (अधृष्टाः) अबाध्यानि (पुरः) नगराणि (कृणुध्वम्) कुरुत (वः) युष्माकं (चमसः) चमन्ति भक्षयन्ति यस्मिन् स भोजनागारः “चमु अदने” [भ्वादि०] “चमु भक्षणे” [स्वादि०] ततोऽसच् प्रत्ययः [उणा० ३।११७] (मा सुस्रोत्) न स्रवितो भवेत्-न न्यूनो भवेत् (तं दृंहत) तं दृढं कुरुत ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Establish stalls for cattle, build roads, sew corselets and build great walls, that would be the safety and security measure for people. Build cities of steel undaunted. May your ladle of yajna divine and human never suffer leakage. Strengthen the ladle, raise and expand the quality of life.