Go To Mantra
Viewed 431 times

स इ॑धा॒नो वसु॑ष्क॒विर॒ग्निरी॒ळेन्यो॑ गि॒रा। रे॒वद॒स्मभ्यं॑ पुर्वणीक दीदिहि ॥

English Transliteration

sa idhāno vasuṣ kavir agnir īḻenyo girā | revad asmabhyam purvaṇīka dīdihi ||

Mantra Audio
Pad Path

सः। इ॒धा॒नः। वसुः॑। क॒विः। अ॒ग्निः। ई॒ळेन्यः॑। गि॒रा। रे॒वत्। अ॒स्मभ्य॑म्। पु॒रु॒ऽअ॒णी॒क॒। दी॒दि॒हि॒ ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:79» Mantra:5 | Ashtak:1» Adhyay:5» Varga:27» Mantra:5 | Mandal:1» Anuvak:13» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

Word-Meaning: - हे (पुर्वणीक) बहुत सेनाओं से युक्त ! जो तू जैसा इन्धनों से (अग्निः) अग्नि प्रकाशमान होता है, वैसे (इन्धानः) प्रकाशमान (गिरा) वाणी से (ईळेन्यः) स्तुति करने योग्य (वसुः) सुख को बसानेवाला और (कविः) सर्वशास्त्रवित् होता है (सः) सो (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (रेवत्) बहुत धन करनेवाला सब विद्या के श्रवण को (दीदिहि) प्रकाशित करे ॥ ५ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से (श्रवः) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जैसे बिजुली प्रसिद्ध पावक सूर्य अग्नि सब मूर्तिमान् द्रव्य को प्रकाश करता है, वैसे सर्वविद्यावित् सत्पुरुष सब विद्या का प्रकाश करता है ॥ ५ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

धन+ज्ञान

Word-Meaning: - १. (सः) = वह (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (इधानः) = दीप्त है । सहस्रों सूर्यों के समान उस प्रभु का प्रकाश है । (वसुः) = वे प्रभु सबको उत्तम निवास देनेवाले हैं, (कविः) = क्रान्तदर्शी हैं, सर्वज्ञ हैं । सर्वज्ञाता के अभाव में सबका कल्याण करना सम्भव भी तो नहीं । ये प्रभु (गिरः) = वेदवाणी के द्वारा (ईळेन्यः) = स्तुति के योग्य हैं । उपासक को चाहिए कि इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा प्रभु का उपासन करे । हे (पुर्वणीक) = [अनीक - Brilliance, lustre] अनन्तज्ञान की दीप्तिवाले प्रभो ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (रेवत्) = धनयुक्त होकर (दीदिहि) = दीप्त होओ, अर्थात् हमें धन भी प्राप्त कराइए और ज्ञान का प्रकाश भी । धन हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन बनेगा और ज्ञान हमें उस धन के दुरुपयोग से बचाएगा । हम संसारयात्रा में धन से सब आवश्यक साधनों को जुटा पाएँगे और ज्ञान के द्वारा उस धन के दास नहीं बनेंगे । ज्ञानपूर्वक प्रभु का उपासन ही एकमात्र साधन है जिससे कि यह संसार हमारे लिए दलदल नहीं बन जाता और हम शत्रुओं के दलन की शक्ति से युक्त बने रहते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभुकृपा से हमें ज्ञानयुक्त धन की प्राप्ति हो । हम धनी हों, साथ ही ज्ञानी हों, ताकि धन हमारे निधन का कारण न हो जाए ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे पुर्वणीक ! यस्त्वमिन्धनैरग्निरिवेन्धानो गिरेळेन्यो वसुः कविरसि स त्वमस्मभ्यं रेवच्छ्रवो दीदिहि ॥ ५ ॥

Word-Meaning: - (सः) (इधानः) इन्धनैः पावकवद्विद्यया प्रदीप्तः (वसुः) वासयिता (कविः) सर्वविद्यावित् (अग्निः) पावक इव वर्त्तमानः (इळेन्यः) स्तोतुं योग्यः (गिरा) वाण्या (रेवत्) प्रशस्तधनयुक्तम् (अस्मभ्यम्) (पुर्वणीक) पुरवोऽनीकाः सेना यस्य तत्सम्बुद्धौ (दीदिहि) भृशं प्रकाशय। दीदयति ज्वलति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०१.१६) ॥ ५ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। पूर्वस्मान्मन्त्राच्छ्रव इति पदमनुवर्त्तते। यथा विद्युद्भौमसूर्यरूपेणाऽग्निः सर्वं मूर्त्तं द्रव्यं द्योतयति तथाऽनूचानो विद्वान् सर्वा विद्याः प्रकाशयति ॥ ५ ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, that brilliant lord of light and knowledge, treasure home of wealth and joy, divine visionary of creation, adorable with holy words, lord of wealth, blazing with flames and flaming with forces, may he ever shine and shine us with knowledge.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. पूर्व मंत्राने (श्रवः) या पदाची अनुवृत्ती होते. जसा विद्युत पावकरूपी सूर्य सर्व मूर्तिमान द्रव्यांना प्रकाशित करतो तसे सर्व विद्यावित् सत्पुरुष सर्व विद्यांचा प्रकाश करतो. ॥ ५ ॥