पदार्थान्वयभाषाः - १. (सः) = वह (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (इधानः) = दीप्त है । सहस्रों सूर्यों के समान उस प्रभु का प्रकाश है । (वसुः) = वे प्रभु सबको उत्तम निवास देनेवाले हैं, (कविः) = क्रान्तदर्शी हैं, सर्वज्ञ हैं । सर्वज्ञाता के अभाव में सबका कल्याण करना सम्भव भी तो नहीं । ये प्रभु (गिरः) = वेदवाणी के द्वारा (ईळेन्यः) = स्तुति के योग्य हैं । उपासक को चाहिए कि इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा प्रभु का उपासन करे । हे (पुर्वणीक) = [अनीक - Brilliance, lustre] अनन्तज्ञान की दीप्तिवाले प्रभो ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (रेवत्) = धनयुक्त होकर (दीदिहि) = दीप्त होओ, अर्थात् हमें धन भी प्राप्त कराइए और ज्ञान का प्रकाश भी । धन हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन बनेगा और ज्ञान हमें उस धन के दुरुपयोग से बचाएगा । हम संसारयात्रा में धन से सब आवश्यक साधनों को जुटा पाएँगे और ज्ञान के द्वारा उस धन के दास नहीं बनेंगे । ज्ञानपूर्वक प्रभु का उपासन ही एकमात्र साधन है जिससे कि यह संसार हमारे लिए दलदल नहीं बन जाता और हम शत्रुओं के दलन की शक्ति से युक्त बने रहते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुकृपा से हमें ज्ञानयुक्त धन की प्राप्ति हो । हम धनी हों, साथ ही ज्ञानी हों, ताकि धन हमारे निधन का कारण न हो जाए ।