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जुष्टो॒ हि दू॒तो असि॑ हव्य॒वाह॒नोऽग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म् । स॒जूर॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ सु॒वीर्य॑म॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥

English Transliteration

juṣṭo hi dūto asi havyavāhano gne rathīr adhvarāṇām | sajūr aśvibhyām uṣasā suvīryam asme dhehi śravo bṛhat ||

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Pad Path

जुष्टः॑ । हि । दू॒तः । असि॑ । ह॒व्य॒वाहनः । अग्ने॑ । र॒थीः । अ॒ध्व॒राणा॑म् । स॒जूः । अ॒श्विभ्या॑म् । उ॒षसा॑ । सु॒वीर्य॑म् । अ॒स्मे इति॑ । धे॒हि॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत्॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:44» Mantra:2 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:28» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:9» Mantra:2


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर विद्वानों के सङ्ग के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

Word-Meaning: - हे (अग्ने) पावक के समान राजविद्या के जाननेवाले विद्वान् ! (हि) जिस कारण आप (जुष्टः) प्रसन्न प्रकृति और (दूतः) शत्रुओं को ताप करानेवाले होकर (अध्वराणाम्) अहिंसनीय यज्ञों को सिद्ध करते (रथीः) प्रशंसनीय रथयुक्त (हव्यवाहनः) देने लेने योग्य वस्तुओं को प्राप्त होने (सजूः) अपने तुल्यों के सेवन करनेवाले (असि) हो इससे (अस्मे) हम लोगों में (अश्विभ्याम्) वायु जल (उषसा) प्रातःकाल में सिद्ध हुई क्रिया से सिद्ध किये हुए (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) उत्तम पराक्रम कारक (श्रवः) सब विद्या के श्रवण का निमित्त अन्न को (धेहि) धारण कीजिये ॥२॥
Connotation: - कोई मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या को प्राप्त, शत्रु को जीतके उत्तम पराक्रम चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता और अग्नि जल आदि के योग के विना उत्तम व्यवहार की सिद्धि भी नहीं कर सकता ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

बृहत् श्रव

Word-Meaning: - १. हे प्रभो ! आप (जुष्टः) - प्रीतिपूर्वक सेवित व उपासित हुए - हुए (हि) - निश्चय से (दूतः असि) - वेदरूप ज्ञान - सन्देश के प्राप्त करानेवाले हैं । हम जब प्रभु का उपासन करते हैं तब प्रभु हमें ज्ञान देते हैं ।  २. हे प्रभो ! आप (हव्यवाहनः) - सब उत्तम पदार्थों को देनेवाले हैं ।  ३. हे (अग्ने) - अग्नणी प्रभो ! आप (अध्वराणां रथीः) - सब हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों के सञ्चालक हैं । प्रभुभक्तों के जीवनों के माध्यम से सब यज्ञात्मक कर्मों को प्रभु ही कर रहे होते हैं ।  ४. हे प्रभो ! (अश्विभ्याम्) - प्राणापानो व (उषसा, सजूः) - उषः काल के साथ (अस्मे) - हमारे लिए (सुवीर्यम्) - उत्तम वीर्य को (धे) - स्थापित कीजिए । शक्ति को प्राप्त करके ही तो हम यज्ञात्मक कर्मों को कर पाएँगे ।  ५. इस शक्ति की प्राप्ति के लिए (बृहत्) - वृद्धि के कारणभूत (श्रवः) - अन्न को हममें धारण कीजिए [श्रवः, अन्ननाम, नि०] ।  ६. वस्तुतः यह 'बृहत् श्रव' हममें सुवीर्य को उत्पन्न करेगा । इस वीर्य को सुरक्षित करने के लिए प्राणसाधना व उषः जागरण सहायक हैं । सुवीर्य बनकर हम यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं । यज्ञशील पुरुष हव्य का ही सेवन करता है । यह 'हव्य - सेवन' ही प्रभु का उपासन हो जाता है और उपासित प्रभु ज्ञान का सन्देश प्राप्त कराते हैं ।   
Connotation: - भावार्थ - हमें चाहिए कि [क] वृद्धि के कारणभूत अन्न का ही सेवन करें । [ख] सुवीर्य को प्राप्त करें । [ग] प्राणसाधना व प्रातः जागरण द्वारा वीर्य की रक्षा करें । [घ] यज्ञशील हों । [ङ] हव्य का ही सेवन करें । [च] प्रभु का उपासन करें । [छ] उसके ज्ञान - सन्देश को सुनें ।   

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(जुष्टः) प्रीतः सेवितः (हि) खलु (दूतः) शत्रूणामुपतापयिताऽतिप्रतापगुणयुक्तो वा (असि) (हव्यवाहनः) यो हव्यानि ग्राह्यदातव्यानि हुतानि द्रव्याणि यानानि वा वहति प्राप्नोति सः (अग्ने) राजविद्याविचक्षण (रथीः) प्रशस्ता रथा यस्य सन्ति सः। अत्र छन्दसीवनिपौ च वक्तव्यौ। अ० ५।२।१०९। अनेन# रथशब्दान्मत्वर्थ ईप्रत्ययः। (अध्वराणाम्) अहिंसनीयानां यज्ञानां मध्ये (सजूः) यः समानान् जुषते। अत्र जुष धातोः क्विप् समानस्य सादेशश्च (अश्विभ्याम्) वायुजलाभ्याम् (उषसाः) प्रातःकालेन युक्तया क्रियया (सुवीर्य्यम्) सुष्ठुवीर्य्याणि यस्य सः (अस्मे) अस्मासु। अत्र सुपां सुलुग् इति सप्तम्याः स्थाने शे आदेशः। (धेहि) धर (श्रवः) सर्वविद्याश्रवणनिमित्तमन्नम् (बृहत्) महत्तमम् ॥२॥ #[वार्त्तिकेन। सं०।]

Anvay:

पुनर्विद्वत्संगगुणा उपदिश्यन्ते।

Word-Meaning: - हे अग्ने विद्वन् ! यतस्त्वं जुष्टो दूतः सन्नध्वराणां रथीर्हव्यवाहनः सजूरसि तस्मादस्मे अश्विभ्यामुषसा सिद्धं बृहत्सुवीर्य्यं श्रवो धेहि ॥२॥
Connotation: - नहि कश्चिद्विदुषां सङ्गेन विना सर्वविद्यां प्राप्य शत्रुविजयमुत्तमं पराक्रमं चक्रवर्त्यादिश्रियं च प्राप्तुं शक्नोति। नहि खल्वग्नेर्जलादियोगेन विनोत्तमव्यवहारसिद्धिं च प्राप्तुमर्हतीति ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, ruling lord of light and the world, invoked and lighted, you are the blazing catalyst and carrier of yajnic materials offered and fragrances received. You are the leading chariot hero of the world’s yajnic acts of love and creation. Friend of the Ashvins, sun and moon, water and air, working with the complementary powers of nature, friend and companion of ours too, bring us noble strength and valour, bless us with universal honour and fame.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Anvay:

O learned person well-versed in Political Science, thou art well-loved messenger, destroyer of the wicked and mighty, charioteer of the noble non-violent deeds, impeller of the substances or vehicles to be taken and given. Grant us heroic strength and food that makes us virile and full of knowledge along with the air and water and the act done at the dawn.

Word-Meaning: - (अग्ने) राजविद्याविचक्षण = Well versed in Political science. ( अश्विभ्याम् ) वायुजलाभ्याम् = With the combination of the air and water. ( श्रवः ) सर्वविद्याश्रवणनिमित्तम् अन्नम् = Food which by giving proper strength enables us to acquire knowledge of various sciences.
Connotation: - None can conquer his enemies, get strength and prosperity without the association of the learned and acquisition of knowledge from them. None can accomplish worldly dealings without the combination and proper methodical use of the fire, air and water.
Footnote: As for the first Mantra, there is a spiritual interpretation, as pointed out by Rishi Dayananda (himself) following is the spiritual meaning of the above Mantra- O God, thou art well-loved messenger, Destroyer of the wicked, Sustainer of the world and Charioteer of the noble nonviolent deed, accordant with the sun and the moon and the dawn or Prana, Apana and the Dawn of the Divine Illumination, grant us heroic strength and lofty fame.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - कोणताही माणूस विद्वानांच्या संगतीशिवाय विद्या प्राप्ती होण्यास समर्थ बनू शकत नाही. तसेच शत्रूला जिंकून उत्तम पराक्रम, चक्रवर्ती राज्यलक्ष्मीही प्राप्त करू शकत नाही व अग्नी, जल इत्यादीशिवाय उत्तम व्यवहाराची सिद्धीही करू शकत नाही. ॥ २ ॥