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दे॒वास॑स्त्वा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा सं दू॒तं प्र॒त्नमि॑न्धते । विश्वं॒ सो अ॑ग्ने जयति॒ त्वया॒ धनं॒ यस्ते॑ द॒दाश॒ मर्त्यः॑ ॥

English Transliteration

devāsas tvā varuṇo mitro aryamā saṁ dūtam pratnam indhate | viśvaṁ so agne jayati tvayā dhanaṁ yas te dadāśa martyaḥ ||

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Pad Path

दे॒वासः॑ । त्वा॒ । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । सम् । दू॒तम् । प्र॒त्नम् । इ॒न्ध॒ते॒ । विश्व॑म् । सः । अ॒ग्ने॒ । ज॒य॒ति॒ । त्वया॑ । धन॑म् । यः । ते॒ । द॒दाश॑ । मर्त्यः॑॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:36» Mantra:4 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:8» Mantra:4 | Mandal:1» Anuvak:8» Mantra:4


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह दूत कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

Word-Meaning: - हे (अग्ने) धर्म विद्या श्रेष्ठ गुणों से प्रकाशमान सभापते ! (यः) जो (ते) तेरा (दूतः) दूत (मर्त्त्यः) मनुष्य तेरे लिये (धनम्) विद्या राज्य सुवर्णादि श्री को (ददाश) देता है तथा जो (त्वया) तेरे साथ शत्रुओं को (जयति) जीतता है (मित्रः) सबका सुहृद् (वरुणः) सबसे उत्तम (अर्यमा) न्यायकारी (देवासः) ये सब सभ्य विद्वान् मनुष्य जिसको (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रशंसित जानकर स्वीकार के लिये शुभगुणों से प्रकाशित करें जो (त्वा) तुझ और सब प्रजा को प्रसन्न रक्खे (सः) वह दूत (प्रत्नम्) जोकि कारणरूप से अनादि है (विश्वम्) सब राज्य को सुरक्षित रखने को योग्य होता है ॥४॥
Connotation: - कोई भी मनुष्य सब शास्त्रों में प्रवीण राजधर्म को ठीक-२ जानने, पर अपर इतिहासों के वेत्ता, धर्मात्मा, निर्भयता से सब विषयों के वक्ता, शूरवीर दूतों और उत्तम राजा सहित सभासदों के विना राज्य को पाने, पालने, बढ़ाने और परोपकार में लगाने को समर्थ नहीं हो सकते इससे पूर्वोक्त प्रकार ही से राज्य की प्राप्ति आदि का विधान सब लोग सदा किया करें ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

धन - विजय

Word-Meaning: - १. हे प्रभो ! (दूतम्) - कष्टों की अग्नि में सन्तप्त करके जीवनों को उज्ज्वल करनेवाले (प्रत्नम्) - सनातन - सदा से विद्यमान (त्वा) - आपको (देवासः) - दिव्यवृत्तिवाले लोग, (वरुणः) - द्वेष का निवारण करनेवाले, द्वेष से ऊपर उठनेवाले, (मित्रः) - सबसे स्नेह करनेवाले व सभी को पापों व मृत्युओं से बचानेवाले तथा (अर्यमा) - [अर्यमेति तमाहुर्यो ददाति] दान की वृत्तिवाले जितेन्द्रिय पुरुष (समिन्धते) - अपने हृदय में समिद्ध करते हैं, अर्थात् प्रभु को 'वरुण, मित्र, अर्यमा' की वृत्तिवाले देवलोग ही पाते हैं ।  २. हे (अग्नेः) - सब उन्नतियों के साधक प्रभो ! (यः मर्त्यः) - जो भी मरणधर्मा मनुष्य (ते ददाश) - तेरे प्रति अपना अर्पण करता है - तेरे चरणों में नतमस्तक होकर तेरी आज्ञा के अनुसार चलता है (सः) - वह (त्वया) - तुझ सहायक को प्राप्त करके (विश्वं धनम्) - सम्पूर्ण धन को (जयति) - जीतता है 'धनञ्जय' बनता है । आप सारथि होते हो तो यह 'धनञ्जय' अपने लक्ष्य को पा ही लेता है ।   
Connotation: - भावार्थ - प्रभु को पाने के लिए 'वरुण, मित्र व अर्यमा' बनना चाहिए, 'निद्वेष, स्नेही व दानशील' । प्रभु को अपना अर्पण करनेवाला सम्पूर्ण धनों का विजेता बनता है ।   

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(देवासः) सभ्या विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (वरुणः) उत्कृष्टः (मित्रः) मित्रवत्प्राणप्रदः (अर्य्यमा) न्यायकारी (सम्) सम्यगर्थे (दूतम्) यो दुनोति सामादिभिः शत्रूँस्तम्। दुतनिभ्यां दीर्घश्च। उ० ३।८८#। (प्रत्नम्) कारणरूपेणानादिम्। नश्च पुराणे प्राद्वक्तव्याः*। अ० ५।४।३०। इति पुराणार्थे प्रशब्दात्त्नप् प्रत्ययः। (इन्धते) शुभगुणैः प्रकाशन्ते (विश्वम्) सर्वम् (सः) (अग्ने) धर्मविद्या श्रेष्ठगुणैः प्रकाशमानसभापते (जयति) उत्कर्षति (त्वया) (धनम्) विद्यासुवर्णादिकम् (यः) (ते) तव (ददाश) दाशति। अत्र लङर्थे लिट्। (मर्त्त्यः) मनुष्यः ॥४॥#[उ० ३।९०।] *[नैत्यदृशं कञ्चित् सूत्रं वार्त्तिकं वा० विद्यते। अतः ‘प्रगस्य छन्दसि गलोपश्च’ अ० ४।३।२३ अनेन वार्त्तिकेन ‘प्रत्न’ शब्द सिद्धय्ति। सं०]

Anvay:

पुनः स दूतः कीदृश इत्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे अग्ने सभेश यस्ते दूतो मर्त्त्यो धनं ददाश यस्त्वया सह शत्रूञ्जयति मित्रो वरुणोर्यमा देवासो यं दूतं समिन्धते यस्त्वा त्वां प्रजाञ्च प्रीणाति स प्रत्नं विश्वं राज्यं रक्षितुमर्हति ॥४॥
Connotation: - नहि केचिदपि सर्वशास्त्रविशारदै राजधर्मवित्तमैः परावरज्ञैर्धार्मिकैः प्रगल्भैः शूरैर्दूतैः सराजभिः सभासद्भिश्च विना राज्यं लब्धुं रक्षितुमुन्नेतुमुपकर्त्तुं शक्नुवंति तस्मादेवमेव सर्वैः सदा विधेयमिति ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, brilliant power of heat and light of yajna, harbinger of joy and inspiration, the noblest of the wise and generous people of the world and powers of nature, Varuna the high, Mitra the friendly, and Aryama the fair and just, all kindle and raise you high for the world’s yajna of growth and progress. The man who offers you the holy materials of yajna wins wealth of the world by virtue of your yajnic action.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

How is that ambassador or messenger is taught further.

Anvay:

O President of the Assembly, shining on account of Dharma (righteousness) wisdom and other noble virtues, your messenger who is liberal in giving wealth of all kinds in charity and who conquers enemies with you, whom noble and most acceptable persons, friendly and life-givers to all and just enkindle or instruct, he who pleases you and the people, it is such a true messenger who makes enemies un-easy by adopting peaceful methods that can preserve the State.

Word-Meaning: - ( मित्र:) मित्रप्रदः प्राणप्रद = Life giver like a friend. दूतम् । यो दुनोति सामादिभिः शत्रूंस्तम् । दूतनिभ्य दीर्घश्च । ( उणा० ३-८८) = A messenger.(अग्ने) धर्मविद्याश्रेष्ठगुणैः प्रकाशमान सभापते । = O President of the Assembly, shining on account of Dharma (righteousness), wisdom and noble virtues.
Connotation: - None can achieve, preserve and develop or prosper the State without the brave ambassadors or messengers who are well-versed in all Shastras, the best among the knowers of Political Science and History, righteous and clever. Therefore all should act as stated in these Mantras.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - कोणतीही माणसे सर्व शास्त्रात प्रवीण, राजधर्माला योग्यरीत्या जाणणारी, पर-अपर इतिहासाचे वेत्ते, धर्मात्मे, निर्भयतायुक्त सर्व विषयांचे वक्ते, शूरवीर दूत व उत्तम राजासहित सभासदाविना राज्य प्राप्त करणे, पालन करणे, वाढविणे व परोपकार करणे इत्यादींमध्ये समर्थ बनू शकत नाहीत. त्यामुळे पूर्वोक्त प्रकारानेच राज्याची प्राप्ती इत्यादीचे विधान सर्व लोकांनी करावे. ॥ ४ ॥