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यम॒ग्निं मेध्या॑तिथिः॒ कण्व॑ ई॒ध ऋ॒तादधि॑ । तस्य॒ प्रेषो॑ दीदियु॒स्तमि॒मा ऋच॒स्तम॒ग्निं व॑र्धयामसि ॥

English Transliteration

yam agnim medhyātithiḥ kaṇva īdha ṛtād adhi | tasya preṣo dīdiyus tam imā ṛcas tam agniṁ vardhayāmasi ||

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Pad Path

यम् । अ॒ग्निम् । मेध्य॑अतिथिः । कण्वः॑ । ई॒घे । ऋ॒तात् । अधि॑ । तस्य॑ । प्र । इषः॑ । दी॒दि॒युः॒ । तम् । इ॒माः । ऋचः॑ । तम् । अ॒ग्निम् । व॒र्ध॒या॒म॒सि॒॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:36» Mantra:11 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:10» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:8» Mantra:11


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर सभाध्यक्षादि लोग अग्नि आदि पदार्थों से कैसे उपकार लेवें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

Word-Meaning: - (मेध्यातिथिः) पवित्र सेवक शिष्यवर्गों से युक्त (कण्वः) विद्यासिद्ध कर्मकाण्ड में कुशल विद्वान् (ऋतादधि) मेघमण्डल के ऊपर से सामर्थ्य होने के लिये (यम्) जिस (अग्निम्) दाहयुक्त सब पदार्थों के काटनेवाले अग्नि को (ईधे) प्रदीप्त करता है (तस्य) उस अग्नि के (इषः) घृतादि पदार्थों को मेघमण्डल में प्राप्त करनेवाले किरण (प्र) अत्यन्त (दीदियुः) प्रज्वलित होते हैं और (इमाः) ये (ऋचः) वेद के मंत्र जिस अग्नि के गुणों का प्रकाश करते हैं (तम्) उसी (अग्निम्) अग्नि को सभाध्यक्षादि राजपुरुष हम लोग शिल्प क्रियासिद्धि के लिये (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं ॥११॥
Connotation: - सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि होता आदि विद्वान् लोग वायु वृष्टि के शोधक हवन के लिये जिस अग्नि को प्रकाशित करते हैं जिसके किरण ऊपर को प्रकाशित होते और जिसके गुणों को वेदमंत्र कहते हैं उसी अग्नि को राज्य साधक क्रियासिद्धि के लिये बढ़ावें ॥११॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मेध्यातिथि

Word-Meaning: - १. (यम्) - जिस (अग्निम्) - अग्रणी प्रभु को (मेध्यातिथिः) - पवित्रता की ओर व पवित्र यज्ञादि कर्मों की ओर निरन्तर चलनेवाला (कण्वः) - मेधावी पुरुष (ऋतात् अधि ईथे) - ऋत के द्वारा, नियमित क्रियाओं के द्वारा आधिक्येन दीप्त करता है, (तस्य) - उस प्रभु को ही (इमाः) - ये सब (ऋचः) - ऋचाएँ बढ़ाती हैं - ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्, सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति', - सब ऋचाएँ उस व्यापक अविनाशी परमात्मा में ही स्थित हैं और सारे वेद उस प्राप्त करने योग्य प्रभु को ही प्रतिपादित कर रहे हैं ।  ३. हम सब भी (तम् अग्निम्) - उस सर्वाग्रणी प्रभु को ही (वर्धयामसि) - बढ़ाते हैं, अर्थात् उस प्रभु का ही स्तवन करते हैं ।   
Connotation: - भावार्थ - हम कण्व बनकर ऋत का पालन करें । यह ऋत का पालन ही हमें प्रभु के प्रकाश को प्राप्त कराएगा । ये प्रभु ही सब छन्दों में प्रतिपाद्य हैं ।   

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(यम्) (अग्निम्) दाहगुणविशिष्टं सर्वपदार्थछेदकं च (मेध्यातिथिः) पवित्रैः पूजकैः शिष्यवर्गैर्युक्तो विद्वान् (कण्वः) विद्याक्रियाकुशलः (ईधे) दीपयते। अत्र लङर्थे लिट्। इजादेश्चगुरुमतोनृच्छः। अ० ३।१।३६। इत्यमंत्र इतिप्रतिषेधा इदाम्# निषेधः। इन्धिभवतिभ्याञ्च। अ० १।२।६। इतिलिटः कित्त्वाद् अनिदिताम०* इति नलोपोगुणाऽभावश्च। (ऋतात्) मेघमण्डलादुपरिष्टादुदकात् (अधि) उपरिभावे (तस्य) अग्नेः (प्र) प्रकृष्टार्थे (इषः) प्रापिका दीप्तयो रश्मयः (दीदियुः) दीयन्ते दीदयतीति ज्वलतिकर्मसु पठितम्। निघं० १।१६। दीङ्क्षय इत्यस्माद्। व्यत्ययेन परस्मैपदमभ्यासस्य ह्रस्वत्वे वाच्छन्दसि सर्वेविधयो भवन्ती इत्यनभ्यासस्य ह्रस्वः। सायणाचार्येणेदं पदमन्यथा व्याख्यातम् (तम्) यज्ञस्य मुख्यं साधनम् (इमाः) प्रत्यक्षाः (ऋचः) वेदमंत्राः (तम्) विद्युदाख्यम् (अग्निम्) सर्वत्रव्यापकम् (वर्धयामसि) वर्धयामः ॥११॥ #[अमन्त्रे इति पूर्वसूत्रादनुवृत्तौ सत्यामाम् निषेधः, इत्यर्थः। सं०] *[अ० ६।४।२४]

Anvay:

पुनरेतैरग्न्यादिपदार्थाः कथमुपकर्त्तव्याः।

Word-Meaning: - मेध्यातिथिः कण्व ऋतादधि यमग्निमीधे तस्येषो प्रदीदियुरिमा ऋचस्तं वर्णयन्ति तमेवाग्निं राजपुरुषा वयं शिल्पक्रियासिद्धये वर्धयामसि ॥११॥
Connotation: - सभाध्यक्षादिराजपुरुषैर्होत्रादयो विद्वांसो वायुवृष्टिशुद्ध्यर्थहवनाय यमग्निं दीपयन्ति यस्य रश्मय ऊर्ध्वं प्रकाशन्ते यस्य गुणान् वेदमन्त्रा वदन्ति स राजव्यवहारसाधकशिल्पक्रियासिद्धय एव वर्द्धनीयः ॥११॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The fire and energy which kanva, expert scholar of science and practical work, karma kanda, in company with his disciples of technical yajna, captured and lighted from the waves and waters over the sky, and whose flames reach beyond the sky over the clouds, these hymns of celebration illumine and the same we develop and augment.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Anvay:

We, workers of the State and others, extol for the accomplishment of the works of art and industry the fire (in the form of electricity) whom a wise man, expert in knowledge and action and surrounded by pure-minded pupils kindles from the water above the clouds and whose rays pre-eminently shine. These Vedic Mantras describe that Agni variously.

Word-Meaning: - (मेध्यातिथिः) पवित्रैः पूजकैः शिष्यवर्गेर्युक्तो विद्वान् = A learned person accompanied by pure and devoted pupils. ( कण्व:) विद्याक्रियाकुशल: = A highly intelligent expert in knowledge and action.[ कण्व इति मेधाविनाम निघ० ३.१५] [ऋतात् अघि] मेघमण्डलादुपरिष्टात् उदकात् = From the water above the clouds. ( इष:) प्रापिका दीप्तयो रश्मयः = Lustres or rays (इष-गतौ — गतेस्त्रयोऽर्था: शानं गमनं प्राप्तिश्च मन्त्र प्रकाशप्रापिका दीप्तय:)
Connotation: - The President of the Assembly and other persons of the State should properly utilize the fire which is kindled by the priests and other learned men for the homa that is meant to purify the air and the rain and whose glows or lusters go upwards, whose properties are mentioned in the Vedic Mantras, for the accomplishment of the work of arts and industries that is helpful for administrative purposes.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - सभाध्यक्ष इत्यादी राजपुरुष, होता इत्यादी विद्वान लोक वायू वृष्टीच्या शुद्धीसाठी हवन करून ज्या अग्नीला प्रकाशित करतात व ज्याचे किरण वर प्रकाशित होतात व ज्याच्या गुणांना वेदमंत्राद्वारे वर्णित केले जाते, त्या अग्नीला राज्यसाधक क्रियासिद्धीसाठी वृद्धिंगत करावे. ॥ ११ ॥