Go To Mantra

त्रिर्नो॑ अश्विना यज॒ता दि॒वेदि॑वे॒ परि॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीम॑शायतम् । ति॒स्रो ना॑सत्या रथ्या परा॒वत॑ आ॒त्मेव॒ वातः॒ स्वस॑राणि गच्छतम् ॥

English Transliteration

trir no aśvinā yajatā dive-dive pari tridhātu pṛthivīm aśāyatam | tisro nāsatyā rathyā parāvata ātmeva vātaḥ svasarāṇi gacchatam ||

Mantra Audio
Pad Path

त्रिः । नः॒ । अ॒स्वि॒ना॒ । य॒ज॒ता । दि॒वेदि॑वे । परि॑ । त्रि॒धातु॑ । पृ॒थि॒वीम् । अ॒शा॒य॒त॒म् । ति॒स्रः । ना॒स॒त्या॒ । र॒थ्या॒ । प॒रा॒वतः॑ । आ॒त्माइ॑व । वातः॒ । स्वस॑राणि । ग॒च्छ॒त॒म्॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:34» Mantra:7 | Ashtak:1» Adhyay:3» Varga:5» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:7» Mantra:7


Reads 498 times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

Word-Meaning: - हे (नासत्या) असत्य व्यवहार रहित (यजता) मेल करने तथा (रथ्या) विमानादि यानों को प्राप्त करानेवाले (अश्विना) जल और अग्नि के समान कारीगर लोगो ! तुम दोनों (पृथिवी) भूमि वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर (त्रिः) तीन बार (पर्य्यशायतम्) शयन करो (आत्मेव्) जैसे जीवात्मा के समान (वातः) प्राण (स्वसराणि) अपने कार्य्यों में प्रवृत्त करनेवाले दिनों को नित्य-२ प्राप्त होते हैं वैसे (गच्छतम्) देशान्तरों को प्राप्त हुआ करो और जो (नः) हम लोगों के (त्रिधातु) सोना चांदी आदि धातुओं से बनाये हुए यान (परावतः) दूरस्थानों को (तिस्रः) ऊंची नीची और सम चाल चलते हुए मनुष्यादि प्राणियों को पहुंचाते हैं उनको कार्यसिद्धि के अर्थ हम लोगों के लिये बनाओ ॥७॥
Connotation: - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। संसारसुख की इच्छा करनेवाले पुरुष जैसे जीव अन्तरिक्ष आदि मार्गों से दूसरे शरीरों को शीघ्र प्राप्त होता और जैसे वायु शीघ्र चलता है वैसे ही पृथिव्यादि विकारों से कलायन्त्र युक्त यानों को रच और उनमें अग्नि जल आदि का अच्छे प्रकार प्रयोग करके चाहे हुए दूर देशों को शीघ्र पहुंचा करें इस काम के विना संसारसुख होने को योग्य नहीं है ॥७॥
Reads 498 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

इडा, पिंगला व सुषुम्णा में प्राण - विचरण

Word-Meaning: - १. हे (यजता) - आदरणीय व संगतिकरण योग्य (अश्विना) - प्राणापानो ! आप (नः) - हमें (दिवे - दिवे) - प्रतिदिन (त्रिधातु) - 'वात, पित्त व कफ' इन तीनों से धारण किये गये (पृथिवीम्) - इस पार्थिव शरीर में (त्रिः) - तीन बार, तीन प्रकार से (परि अशायतम्) - व्यापक निवास करनेवाले होओ । जागरित अवस्था में जैसे हम 'स्थूलशरीर' में निवास करते हैं और स्वप्नावस्था में 'सूक्ष्मशरीर' में रह रहे होते हैं, उसी प्रकार प्रतिदिन सुषुप्ति में 'कारणशरीर' में निवास करनेवाले हों । यदि हम स्थूल व सूक्ष्म शरीर में ही रह जाते हैं तो हमारा यहाँ निवास अधूरा ही होता है । प्राणापानों की कृपा से हमारा यह निवास पूर्ण हो और हम इस शरीर में तीन प्रकार से, न कि दो ही रूपों में, निवास करनेवाले हों, स्थूलशरीर में हम "वैश्वानर" सब मनुष्यों के लिए हितकर कर्मों में ही प्रवृत्त हों, सूक्ष्मशरीर में [इन्द्रिय, प्राण, मन व बुद्धि में] हम 'तेजस्' - तेजस्विता को लिये हुए हों और कारणशरीर में हम "प्राज्ञ" सर्वोत्कृष्ट बुद्धि का सम्पादन करें । हे ! (रथ्या) - शरीररूप रथ को उत्तम बनानेवाले (नासत्या) - कभी भी असत्य को न आने देनेवाले प्राणापानो ! आप (परावतः) - सुदूर स्थानों में स्थित नाड़ियों से, अर्थात् शरीर के कोने - कोने में स्थित नाड़ियों में विचरण करते हुए आप उन नाड़ियों से (तिस्त्रः) - इडा, पिंगला व सुषम्णा इन नाड़ियों को उसी प्रकार (गच्छतम्) - प्राप्त होओ (इव) - जिस प्रकार (वातः) - निरन्तर गतिशील आत्मा - शरीर का स्वामी (स्वसराणि) - स्व के, आत्मा के सरण - स्थानभूत शरीरों को प्राप्त होता है । ये शरीर स्व - सर है - आत्मा इनके अन्दर विचरण करता है । आत्मा जैसे इन शरीरों में विचरण करता है उसी प्रकार प्राणापान, इडा, पिंगला व सुषुम्णा इन नाड़ियों में विचरण करें । वस्तुतः योग - मार्ग में प्रगति हो जाने पर हम प्राणों को इन नाड़ियों में स्थापित कर पाते हैं और उसी समय हमारे ये शरीर स्व - सर - आत्मा की ओर सरण करनेवाले होते हैं । ये शरीर उस समय भोग - मार्ग से दूर हो जाते हैं एवं प्राणापान की साधना हमें भोग से ऊपर उठाकर प्रभु - प्रवण करती है ।   
Connotation: - भावार्थ - प्राणापान की कृपा से हमारा निवास पूर्ण हो, हम भोगों से ऊपर उठकर प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाले बनें । वैश्वानर हों, तैजस हों तथा प्राज्ञ बनें ।   
Reads 498 times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

(त्रिः) त्रिवारम् (नः) अस्माकम् (अश्विना) जलाग्नी इव शिल्पिनौ (यजता) यष्टारौ संगन्तारौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (दिवेदिवे) प्रतिदिनम् (परि) सर्वतो भावे (त्रिधातु) सुवर्णरजतादि धातु संपादितम् (पृथिवीम्) भूमिमन्तरिक्षं वा। पृथिवीत्यन्तरिक्षमामसु पठितम्। निघं० १।३। (अशायतम्) शयाताम्। अत्र लोडर्थे लङ्। अशयातामिति प्राप्ते ह्रस्वदीर्घयोर्व्यत्ययासः। (तिस्रः) ऊर्ध्वाधः समगतीः (नासत्या) नविद्यतेऽसत्यंययोस्तौ (रथ्या) यौ रथविमानादिकं यानं वहतस्तौ (परावतः) दूरस्थानानि। परावतः प्रेरितवतः परागताः। निरु० ११।४८। परावत इति दूरनामसु पठितम्। निघं० ३।२६। आत्मेव आत्मनः शीघ्रगमनवत् (वातः) कलाभिर्भ्रामितो वायुः (स्वसराणि) स्व-२ कर्य्यप्रापकाणिदिनानि। स्वसराणीति पदनामसु पठितम्। निघं० ४।२। अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते (गच्छतम्) ॥७॥

Anvay:

पुनस्तौ कीदृशौ स्त इत्युपदिश्यते।

Word-Meaning: - हे नासत्यौ यजतौ रथ्यावश्विनाविव शिल्पिनौ युवां पृथिवीं प्राप्य त्रिः पर्य्यशयातमात्मेव वातः प्राणश्च स्वसराणि दिवे दिवे गच्छति तद्वद्गच्छतं नोऽस्माकं त्रिधातु यानं परावतो मार्गाँस्तिस्रो गतीर्गमयतम् ॥७॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः। ऐहिकसुखमभीप्सवोजना यथा जीवोऽन्तरिक्षादिमार्गैः सद्यः शरीरान्तरं गच्छति यथा च वायुः सद्यो गच्छति तथैव पृथिव्यादिविकारैः कलायन्त्रयुक्तानि यानानि रचयित्वा तत्र जलाग्न्यादीन् संप्रयोज्याभीष्टान् दूरदेशान् सद्यः प्राप्नुयुः। नैतेन कर्मणा विना सांसारिकं सुखं भवितुमर्हति ॥७॥
Reads 498 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Ashvins, expert powers of science and technology, truthful, devoted to yajna and working together like fire and water, and masters of the three- metal chariot, day by day go round the earth and sky thrice for us and then come to sleep on the earth. Just as the soul goes from one body to another, as winds blow from one place to another, so by the threefold, three way, three speed chariot, move from one chariot to another and go to the destinations of your choice.
Reads 498 times

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The same subject is continued.

Anvay:

O absolutely truthful respectable artisans who are like the fire and water useful for vehicles, go round the world and go to the firmament and then rest thrice. (Three times more than usual on account of exhaustion). As the soul goes to the middle region before taking another body or as the vital air is fast moving as we see every day, so you should also be active and take our aero plane and other speedy vehicles made of gold, silver and other metals to distant places, with high, low and middle speed as is required.

Word-Meaning: - ( अश्विना ) जलाग्नी इव शिल्पिनौ = Artisans like the water and fire. त्रिधातु सुवर्णरजतादिधातुसम्पादितम् = A vehicle made of gold, silver and other metals. (नासत्यौ) न विद्यतेऽसत्यं ययोः = Absolutely truthful( स्वसराणि) स्वस्वकार्यमाप्रापकाणि दिनानि = The days which lead us to our actions. स्वसराणीति पदनामसु पंठितम् ( निघ० ४.२ ) अनेन माप्त्यर्थो गृहयते ||
Connotation: - There is Upamalankara or simile used in the Mantra. Those who desire worldly happiness, should construct vehicles with parts of the earth and other elements and mechanical devices and by the proper use and combination of the water and fire should go soon to distant countries, as the soul soon goes to another body by the path of the firmament after death. None can enjoy worldly happiness without this act.
Footnote: Though Rishi Dayananda has explained स्वसराणि as स्वस्वकार्य प्रापकाणि दिनानि and quoted only from the Nighantu 4.5 it can very well be quoted from the Nighantu 1.9 where it is clearly stated स्वसरणीति अहर्नाम ( निघ० १०१ ) = Svasarani – Days. When in the Nighantu 5.6 अश्विनौ is पदनाम पद गतेस्त्रयोऽर्थाः ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च ॥ by taking the 2nd and third meaning the word can very well be used for a water and fire, proper combination of which enables a man to have speedy locomotion, in the form of steam.
Reads 498 times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. संसार सुखाची इच्छा करणाऱ्या पुरुषांनी जसा जीव अंतरिक्ष इत्यादी मार्गांनी दुसऱ्या शरीरांना तात्काळ प्राप्त करतो व जसा वायू तात्काळ वाहतो तसे पृथ्वीच्या विकाराने कलायंत्रयुक्त याने तयार करून त्यात अग्नी, जल इत्यादींचा चांगल्या प्रकारे उपयोग करून इच्छित स्थानी लवकर पोहोचावे. या कामाशिवाय संसारसुख मिळत नाही. ॥ ७ ॥