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ये शु॒भ्रा घो॒रव॑र्पसः सुक्ष॒त्रासो॑ रि॒शाद॑सः। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

English Transliteration

ye śubhrā ghoravarpasaḥ sukṣatrāso riśādasaḥ | marudbhir agna ā gahi ||

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Pad Path

ये। शु॒भ्राः। घो॒रऽव॑र्पसः। सु॒ऽक्ष॒त्रासः॑। रि॒शाद॑सः। म॒रुत्ऽभिः॑। अ॒ग्ने॒। आ। ग॒हि॒॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:19» Mantra:5 | Ashtak:1» Adhyay:1» Varga:36» Mantra:5 | Mandal:1» Anuvak:5» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर भी उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

Word-Meaning: - (ये) जो (घोरपर्वसः) घोर अर्थात् जिनका पदार्थों को छिन्न-भिन्न करनेवाला रूप जो और (रिशादसः) रोगों को नष्ट करनेवाले (सुक्षत्रासः) तथा अन्तरिक्ष में निर्भय राज्य करनेहारे और (शुभ्राः) अपने गुणों से सुशोभित पवन हैं, उनके साथ (अग्ने) भौतिक अग्नि (आगहि) प्रकट होता अर्थात् कार्य्यसिद्धि को देता है॥५॥
Connotation: - जो यज्ञ के धूम से शोधे हुए पवन हैं, वे अच्छे राज्य के करानेवाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध अर्थात् दुर्गन्ध आदि दोषों से भरे हुए हैं, वे सुखों का नाश करते हैं। इससे मनुष्यों को चाहिये कि अग्नि में होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

तेजस्वी रूप

Word-Meaning: - १. उन्हीं प्राणसाधकों के लिए कहते हैं कि ये वे है (ये) - जो (शुभाः) - अत्यन्त शुद्ध चरित्रवाले हैं । इनके कर्म सदा उज्ज्वल होते हैं । ये कभी निकृष्ट कर्मों से अपने को मलिन नहीं करते । इनके इन्द्रियदोष दग्ध हो जाते हैं ।  २. इसीलिए (घोरवर्पसः) - तेजस्वी रूपवाले होते हैं । (सुक्षत्रासः) - उत्तम बलवाले होते हैं , उस शक्तिवाले होते हैं जोकि इनका क्षतों से त्राण करती है ।  ३. उस उत्तम क्षत्रवाले होकर ये (रिशादसः) - हिंसक वृत्तियों को नष्ट कर डालनेवाले होते हैं अथवा हिंसकों का नाश कर डालते हैं ।  ४. इन सब बातों का विचार करके (अग्ने) - हे प्रगतिशील जीव! तू (मरुद्धिः) - इन प्राणों के द्वारा (आगहि) - प्रभु को प्राप्त होनेवाला हो । 
Connotation: - भावार्थ - प्राणसाधना करनेवाला शुद्धचरित्र , तेजस्वी रूपवाला , उत्तम बलवाला व हिंसकों का नाश करनेवाला बनता है । 

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।

Anvay:

ये घोरवर्पसो रिशादसः सुक्षत्रासः शुभ्रा वायवः सन्ति, तैर्मरुद्भिः सहाग्नेऽग्निरागहि कार्य्याणि प्रापयति॥५॥

Word-Meaning: - (ये) वायवः (शुभ्राः) स्वगुणैः शोभमानाः (घोरवर्पसः) घोरं हननशीलं वर्पो रूपं स्वरूपं येषां ते। वर्प इति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) (सुक्षत्रासः) शोभनं क्षत्रमन्तरिक्षस्थं राज्यं येषां ते (रिशादसः) रिशा रोगा अदसोऽत्तारो ये ते (मरुद्भिः) प्राप्तिहेतुभिः सह। मरुत इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) अनेनात्र प्राप्त्यर्थो गृह्यते। (अग्ने) भौतिकः (आ) आभिमुख्ये (गहि) प्रापयति॥५॥
Connotation: - ये यज्ञेन शोधिता वायवः सुराज्यकारिणो भूत्वा रोगान् घ्नन्ति, ये चाशुद्धास्ते सुखानि नाशयन्ति, तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैरग्निना वायोः शोधनेन सुखानि संसाधनीयानीति॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Those are the winds blessed and beautiful, awful and catalytic, dominating rulers of nature’s metabolism, destroyers of evil and disease. Agni, come with the winds.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

What is the nature of these Mantras is taught further in the fifth Mantra.

Anvay:

Agni (fire) accomplishes works with the help of those Maruts (airs or winds) which are brilliant on account of their attributes, which are fierce in their form, devourers of diseases, rulers of the middle regions or mighty.

Word-Meaning: - (मरुदभिः) प्राप्तिहेतुभि: मरुत इति पदनामसु पठितम् ( निघ० ५.५ ) । अनेनात्र प्राप्त्यर्थो गृह्यते । (सुक्षत्रास:) शोभनंक्षत्रम् अन्तरिक्षस्थं राज्यं येषां ते ।
Connotation: - Airs when purified through the Yajna destroy all diseases and when they are impure, destroy all happiness. Therefore men should enjoy happiness and health by purifying the air with the help of the lire (of the Yajna).
Footnote: Rishi Dayananda has interpreted क्षत्रम् as राज्यं or reign. This interpretation is substantiated by Aitareya Brahman 7-22 क्षत्रं हि राष्ट्रम् (ऐत० ७. २२) It means that the word Kshatra means Rashtra or Government Here ends the thirty sixth Verga.

MATA SAVITA JOSHI

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Word-Meaning: - N/A
Connotation: - यज्ञाच्या धुराने शुद्ध केलेले वायू राज्यातील रोग इत्यादी दोष नष्ट करतात व अशुद्ध अर्थात दुर्गंधाने युक्त वायू सुखाचा नाश करतात. त्यासाठी यज्ञातील अग्नीद्वारे वायू शुद्ध करून माणसांनी अनेक प्रकारचे सुख सिद्ध करावे. ॥ ५ ॥