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आ॑शृ॒ण्वन्तं॒ यवं॑ दे॒वं यत्र॑ त्वाच्छा॒वदा॑मसि। तदुच्छ्र॑यस्व॒ द्यौरि॑व समु॒द्र इ॑वै॒ध्यक्षि॑तः ॥

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Pad Path

आऽशृण्वन्तम् । यवम् । देवम् । यत्र । त्वा । अच्छऽआवदामसि । तत् । उत् । श्रयस्व । द्यौ:ऽइव । समुद्र:ऽइव । एधि । अक्षित: ॥१४२.२॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:142» Paryayah:0» Mantra:2


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

अन्न की वृद्धि का उपदेश।

Word-Meaning: - (आशृण्वन्तम्) [हमें] अङ्गीकार करनेवाले (त्वा) तुझ (देवम्) दिव्यगुणवाले (यवम्) जौ आदि अन्न को (यत्र) जहाँ पर (अच्छावदामसि) हम अच्छे प्रकार चाहें, (तत्) वहाँ पर (द्यौः इव) सूर्य के समान (उत् श्रयस्व) ऊँचा आश्रय ले और (समुद्रः इव) अन्तरिक्ष के समान (अक्षितः) क्षयरहित (एधि) हो ॥२॥
Connotation: - जहाँ पर किसान लोग खेती की अच्छे प्रकार देख-भाल करते हैं, वहाँ जौ अन्न के वृक्ष ऊँचे होते और उपज में अच्छी बढ़ती होती है ॥२॥
Footnote: २−(आशृण्वन्तम्) आङ्+श्रु अङ्गीकारे। अङ्गीकुर्वन्तम् (यवम्) (देवम्) दिव्यगुणम् (यत्र) यस्यां भूमौ (त्वा) (अच्छ−आवदामसि) आभिमुख्येन वदामः प्रार्थयामहे (तत्) तत्र भूम्याम् (उच्छ्रयस्व) (द्यौः इव) प्रकाशमानः सूर्यो यथा (समुद्रः इव) अन्तरिक्षं यथा (एधि) भव (अक्षितः) क्षयरहितः ॥