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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (मैत्रावरुणम्) वायु और सूर्य से किया हुआ (वर्षम्) वर्षाजल (ब्रह्मज्यम् असि) ब्राह्मण को हानि पहुँचानेवाले पर (न) नहीं (वर्षति) वर्षता है। और (न) न (अस्मै) इसके लिये (समितिः) सभा (कल्पते) समर्थ होती है, और (न) न वह (मित्रम्) मित्र को (वशम्) अपने वश में (नयते) लाता है ॥१५॥
Connotation: - वेदविरोधी पुरुष आधिदैविक, आधिभौतिक, और आध्यात्मिक शान्ति न पाकर सदा दुःखी रहता है ॥१५॥
Footnote: १५−(न) निषेधे (वर्षम्) वृष्टिः (मैत्रावरुणम्) तेन निर्वृत्तम्। पा० ४।२।६८। इति मित्रावरुणा−अण्। मित्रावरुणाभ्यां वायुसूर्याभ्यां निर्वृत्तं निष्पादितम् (ब्रह्मज्यम्) म० ७। ब्राह्मणस्य हानिकरम् (अभि) प्रति (वर्षति) सिञ्चति (न) (अस्मै) ब्रह्मविरोधिने (समितिः) सभा (कल्पते) समर्था सफला भवति (न) (मित्रम्) सुहृदम् (नयते) प्रापयति (वशम्) अधीनत्वम् ॥
