वांछित मन्त्र चुनें
देवता: पवमानः सोमः ऋषि: त्रितः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

वृषा॑णं॒ वृष॑भिर्य॒तं सु॒न्वन्ति॒ सोम॒मद्रि॑भिः । दु॒हन्ति॒ शक्म॑ना॒ पय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣāṇaṁ vṛṣabhir yataṁ sunvanti somam adribhiḥ | duhanti śakmanā payaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृषा॑णम् । वृष॑ऽभिः । य॒तम् । सु॒न्वन्ति॑ । सोम॑म् । अद्रि॑ऽभिः । दु॒हन्ति॑ । शक्म॑ना । पयः॑ ॥ ९.३४.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:34» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


390 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - विद्वान् लोग (वृषाणम्) सब कामनाओं के देनेवाले (सोमम्) परमात्मा को (यतम्) ज्ञान का विषय बनाकर (वृषभिः अद्रिभिः) अखिल कामनाओं की साधक इन्द्रियवृत्तियों द्वारा (शक्मना) ज्ञानयोग और कर्म योगद्वारा (सुन्वन्ति) प्रेरणा करते हुए (पयः) ब्रह्मानन्द को (दुहन्ति) दुहते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो लोग कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी बनकर अभ्यास करते हैं, वे ही लोग ब्रह्मामृतरूप दुग्ध को परमात्मरूप कामधेनु से दोहन करते हैं, अन्य नहीं ॥३॥
390 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आप्यायन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वृषाणम्) = शक्ति को देनेवाले, (वृषभिः यतम्) = शक्तिशाली पुरुषों से शरीर में ही संयत किये गये (सोमम्) = सोम को [वीर्यशक्ति को] (अद्रिभिः) = उपासनाओं के द्वारा (सुन्वन्ति) = अपने में उत्पन्न करते हैं। प्रभु की उपासना से सोम शरीर में ही सुरक्षित रहता है । [२] (शक्मना) = शक्ति की प्राप्ति के हेतु से ये उपासक इस सोम से (पयः दुहन्ति) = शरीर में आप्यायन-वर्धन का दोहन करते हैं, प्रपूरण करते हैं। सोम के रक्षण से सब अंगों की शक्ति का वर्धन व आप्यायन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से सब अंगों की शक्ति का वर्धन करते हैं ।
390 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - विद्वांसः (वृषाणम्) सर्वकामदं (सोमम्) परमात्मानं (यतम्) बुद्धिविषयं विधाय (वृषभिः अद्रिभिः) अखिलकामसाधिकाभिः इन्द्रियवृत्तिभिः (शक्मना) ज्ञानयोगेन कर्मयोगेन च (सुन्वन्ति) प्रेरयन्तः (पयः) ब्रह्मानन्दं (दुहन्ति) अनुभवन्ति ॥३॥
390 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Effusive and abundant generative energy of soma, divine creativity, collected and controlled by virile and visionary sages with adamantine discipline of body, sense and mind, later scholarly yogis distil and advance further with their spiritual power and thus create still higher food for the soul.