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दु॒हा॒न ऊध॑र्दि॒व्यं मधु॑ प्रि॒यं प्र॒त्नं स॒धस्थ॒मास॑दत् । आ॒पृच्छ्यं॑ ध॒रुणं॑ वा॒ज्य॑र्षति॒ नृभि॑र्धू॒तो वि॑चक्ष॒णः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

duhāna ūdhar divyam madhu priyam pratnaṁ sadhastham āsadat | āpṛcchyaṁ dharuṇaṁ vājy arṣati nṛbhir dhūto vicakṣaṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दु॒हा॒नः । ऊधः॑ । दि॒व्यम् । मधु॑ । प्रि॒यम् । प्र॒त्नम् । स॒धऽस्थ॑म् । आ । अ॒स॒द॒त् । आ॒ऽपृच्छ्य॑म् । ध॒रुण॑म् । वा॒जी । अ॒र्ष॒ति॒ । नृऽभिः॑ । धू॒तः । वि॒ऽच॒क्ष॒णः ॥ ९.१०७.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:12» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दुहानः) सबको परिपूर्ण करनेवाला (ऊधः) सबका अधिकरणस्वरूप परमात्मा (मधु) आनन्दस्वरूप (प्रत्नं) प्राचीन (सधस्थम्) अन्तरिक्ष स्थान को (प्रियम्) जो प्रिय है, उसको (आसदत्) आश्रय करता है। वह परमात्मा (वाजी) जो बलस्वरूप (विचक्षणः) विलक्षण बुद्धिवाला (नृभिः, धूतः) उपासकों से उपासना किया हुआ (धरुणम्) धारणावाले (आपृच्छ्यम्) जिज्ञासु=यजमान को (अर्षति) प्राप्त होता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष धारणा-ध्यानादि साधनों से सम्पन्न हैं, वे ही उस निराकार ज्योति के ज्ञान के पात्र बन सकते हैं, अन्य नहीं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रत्नं सधस्थम् आसदत्

पदार्थान्वयभाषाः - (ऊधः दिव्यं प्रियं मधु) = वेद धेनु के ज्ञान दुग्धाधार से दिव्य प्रीति जनक सारभूत उत्कृष्ट ज्ञानदुग्ध का दोहन करता हुआ यह सोम (प्रत्नम्) = उस सनातन (सधस्थम्) = सारे विश्व की सहस्थिति के स्थानभूत प्रभु को (आसदत्) = प्राप्त करता है उस प्रभु में आसीन होता है जो (आपृच्छ्यम्) = सब के जिज्ञासा का विषय बनते हैं और (धरुणम्) = सबका धारण करनेवाले हैं। सोम बुद्धि को सूक्ष्म बनाके हमें प्रभु का दर्शन कराता है। यह (वाजी) = शक्ति को प्राप्त करानेवाला सोम (अर्षति) = शरीर में गतिवाला होता है। (नृभिः धूतः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले लोगों से यह कम्पित करके निर्मल किया जाता है । वासनाओं को कम्पित करके दूर करने से यह सोम निर्मल बना रहता है । (विचक्षणः) = यह विशेषेण सब का द्रष्टा होता है । सोम हमारी नीरोगता आदि का ध्यान करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम ज्ञान धेनु से दिव्य प्रिय सारभूत ज्ञानदुग्ध का दोहन करते हैं, प्रभु में आसीन होते हैं, शक्तिशाली व नीरोग बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दुहानः) सर्वेषां परिपूरयिता (ऊधः) सर्वाश्रयश्च सः (मधु) आनन्दस्वरूपं (प्रत्नं) प्राचीनम् (सधस्थं) अन्तरिक्षं (प्रियं) प्रेमाश्रयं (आसदत्) आश्रयति, स परमात्मा (वाजी) बलस्वरूपः (विचक्षणः) सर्वज्ञः (नृभिः, धूतः) भक्तैरुपासितः (आपृच्छ्यम्) जिज्ञासुं (धरुणं) धारणावन्तं च यजमानं (अर्षति) प्राप्नोति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Giver of fulfilment, treasure trove of life’s sustaining milk, yielding celestial dear honey sweets of living strength and joy, pervasive in its eternal universal loved seat, all conqueror all watching and knowing, when moved by meditative celebrants, Soma radiates and vibrates in the faithful heart of earnest seekers.