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अ॒भि सोमा॑स आ॒यव॒: पव॑न्ते॒ मद्यं॒ मद॑म् । स॒मु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑ मनी॒षिणो॑ मत्स॒रास॑: स्व॒र्विद॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi somāsa āyavaḥ pavante madyam madam | samudrasyādhi viṣṭapi manīṣiṇo matsarāsaḥ svarvidaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । सोमा॑सः । आ॒यवः॑ । पव॑न्ते । मद्य॑म् । मद॑म् । स॒मु॒द्रस्य॑ । अधि॑ । वि॒ष्टपि॑ । म॒नी॒षिणः॑ । म॒त्स॒रासः॑ । स्वः॒ऽविदः॑ ॥ ९.१०७.१४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:14 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:14


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आयवः) ज्ञानशील विद्वान् (सोमासः) सर्वोत्पादक परमात्मा के (अभि) अभिमुख (मद्यम्) आह्लाद तथा (मदम्) आनन्द के लिये (पवन्ते) आत्मा को पवित्र करते हैं, (समुद्रस्य) अन्तरिक्ष देश के (अधिविष्टपि) ऊपर (मनीषिणः) मननशील (मत्सरासः) ब्रह्मानन्द का पान करनेवाले (स्वर्विदः) विज्ञानी लोग परमात्मा के रस को पान करते हैं ॥१४॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानी और विज्ञानी लोग ही अपने जप तप आदि संयमों द्वारा परमात्मा के आनन्द को उपलब्ध करते हैं और वही अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमासः) = शरीरस्थ सोमकण (आयवः) = [इ गतौ] हमारे जीवनों को क्रियाशील बनानेवाले हैं । ये (मद्यम्) = अत्यन्त उल्लासजनक (मदम्) = हर्ष को (अभिपवन्ते) = प्राप्त कराते हैं । (समुद्रस्य) = [स+मुद्] उस आनन्दमय प्रभु के (अधिविष्टपि) = उच्च स्थान में ये हमें पहुँचाते हैं । सोमरक्षण द्वारा ही शारीरिक नीरोगता आदि को प्राप्त करके ऐहिक आनन्द मिलता है और मानस नैर्मल्य के द्वारा प्रभुदर्शन के आनन्द का भी यही साधन बनता है। ये सोम (मनीषिणः) = मनीषा को देनेवाले हैं, मन का शासन करनेवाली बुद्धि को प्राप्त कराते हैं । (मत्सरासः) = हृदयों में आनन्द का संचार करते हैं। तथा (स्वर्विदः) = उस स्वयं प्रकाश प्रभु को प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम क्रियाशीलता व उल्लास का जनक होता हुआ 'बुद्धि व मन' को उत्कृष्ट बनाता है और प्रभु प्राप्ति का साधन बनता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आयवः) गतिशीलं (सोमासः, अभि) परमात्मानमभि (मद्यं) आह्लादाय (मदम्) आनन्दाय च (पवन्ते) पवित्रयन्ति (समुद्रस्य) अन्तरिक्षस्य (अधिविष्टपि) उपरि (मनीषिणः) मननशीलाः (मत्सरासः) ब्रह्मानन्दस्य पातारः (स्वर्विदः) विज्ञानिनः तस्य परमात्मनो रसं पिबन्ति ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Intelligent and dedicated lovers of Soma refine and sublimate their pleasurable joy of the heart and emotion, direct it to divinity on top of the existential ocean of daily business and, thoughtful, ecstatic and divinely oriented, experience the heavenly ecstasy of Soma as in samadhi.