मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमासः) = शरीरस्थ सोमकण (आयवः) = [इ गतौ] हमारे जीवनों को क्रियाशील बनानेवाले हैं । ये (मद्यम्) = अत्यन्त उल्लासजनक (मदम्) = हर्ष को (अभिपवन्ते) = प्राप्त कराते हैं । (समुद्रस्य) = [स+मुद्] उस आनन्दमय प्रभु के (अधिविष्टपि) = उच्च स्थान में ये हमें पहुँचाते हैं । सोमरक्षण द्वारा ही शारीरिक नीरोगता आदि को प्राप्त करके ऐहिक आनन्द मिलता है और मानस नैर्मल्य के द्वारा प्रभुदर्शन के आनन्द का भी यही साधन बनता है। ये सोम (मनीषिणः) = मनीषा को देनेवाले हैं, मन का शासन करनेवाली बुद्धि को प्राप्त कराते हैं । (मत्सरासः) = हृदयों में आनन्द का संचार करते हैं। तथा (स्वर्विदः) = उस स्वयं प्रकाश प्रभु को प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम क्रियाशीलता व उल्लास का जनक होता हुआ 'बुद्धि व मन' को उत्कृष्ट बनाता है और प्रभु प्राप्ति का साधन बनता है ।