वांछित मन्त्र चुनें

पव॑मान॒ महि॒ श्रव॑श्चि॒त्रेभि॑र्यासि र॒श्मिभि॑: । शर्ध॒न्तमां॑सि जिघ्नसे॒ विश्वा॑नि दा॒शुषो॑ गृ॒हे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pavamāna mahi śravaś citrebhir yāsi raśmibhiḥ | śardhan tamāṁsi jighnase viśvāni dāśuṣo gṛhe ||

पद पाठ

पव॑मान । महि॑ । श्रवः॑ । चि॒त्रेभिः॑ । या॒सि॒ । र॒श्मिऽभिः॑ । शर्ध॑न् । तमां॑सि । जि॒घ्न॒से॒ । विश्वा॑नि । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे ॥ ९.१००.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:100» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:8


379 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (महि श्रवः) सर्वोपरि यशवाले हैं, (चित्रेभिः) आप नाना प्रकार की (रश्मिभिः) शक्तियों के द्वारा (यासि) सर्वत्र प्राप्त हैं और तुम (शर्धन्) अपनी ज्ञानरूपी गति से (विश्वानि तमांसि) सब अज्ञानों को (जिघ्नसे) हनन करते हो और (दाशुषो गृहे) उपासक के अन्तःकरण में स्थिर होकर आप उसे ज्ञान से प्रकाशित करते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के ज्ञानरूप प्रकाश से सब अज्ञानों का नाश होता है ॥८॥
379 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अज्ञानान्धकार- विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम ! तू (चित्रेभिः रश्मिभिः) = अद्भुत ज्ञानरश्मियों के द्वारा (महि शवः) = महनीय ज्ञान को (यासि) = प्राप्त कराता है [या प्रापणे] । सुरक्षित सोम ही तो ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है । हे सोम ! तू (दाशुषः गृहे) = दाश्वान् के घर में, तेरे प्रति अपना अपना अर्पण करनेवाले के इस शरीरगृह में (शर्धन्) = शक्तिशाली की तरह आचरण करता हुआ (विश्वानि तमांसि) = सब अन्धकारों को (जिप्रसे) = समाप्त करता है। भावार्थ- सुरक्षित सोम अज्ञानान्धकार का विनाशक होता है।
379 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सर्वस्य पावयितः ! भवान् (महि श्रवः) महायशस्कः (चित्रेभिः) अनेकधा (रश्मिभिः) स्वशक्तिभिः (यासि) व्याप्नोति च (शर्धन्) स्वज्ञानमाश्रयन् (दाशुषः गृहे) भक्तान्तःकरणे (विश्वानि, तमांसि) सर्वाण्यज्ञानानि (जिघ्नसे) नाशयति ॥८॥
379 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, pure, purifying vibrant spirit of life divine commanding great power, honour and glory, you go forward with wondrous manifestations of your power, bold and indomitable, destroying the darkness and evils of the world, and reach and bless the yajnic house of the man of charity and generosity.