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देवता: इन्द्र: ऋषि: नोधा छन्द: पङ्क्तिः स्वर: पञ्चमः
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द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम् । क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dyukṣaṁ sudānuṁ taviṣībhir āvṛtaṁ giriṁ na purubhojasam | kṣumantaṁ vājaṁ śatinaṁ sahasriṇam makṣū gomantam īmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्यु॒क्षम् । सु॒ऽदानु॑म् । तवि॑षीभिः । आऽवृ॑तम् । गि॒रिम् । न । पु॒रु॒ऽभोज॑सम् । क्षु॒ऽमन्त॑म् । वाज॑म् । श॒तिन॑म् । स॒ह॒स्रिण॑म् । म॒क्षु । गोऽम॑न्तम् । ई॒म॒हे॒ ॥ ८.८८.२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:88» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:2


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्युक्षं, तविषीभिरावृतम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] उस प्रभु से हम (मक्षू) = शीघ्र (वाजम्) = बल को (ईमहे) = माँगते हैं। जो बल (क्षुमन्तम्) = प्रभु के स्तवन से युक्त है, (शतिनम्) = सौ के सौ वर्ष तक स्थिर रहता है अथवा शतवर्ष के जीवन को प्राप्त कराता है, (सहस्त्रिणम्) = [सहस्] जीवन को आनन्दयुक्त रखता है तथा (गोमन्तम्) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाला है अथवा प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाला है। [२] उन प्रभु से हम बल की याचना करते हैं जो (द्युक्षम्) = ज्ञान की दीप्ति में निवास करनेवाले हैं, (सुदानुम्) = सम्यक् हमारी वासनाओं का ज्ञान द्वारा विनाश करनेवाले हैं [दाप् लवने], (तविषीभिः आवृतम्) = बलों से आवृत हैं - बल ही बल हैं-बल के पुञ्ज हैं। तथा (गिरिं न) = [गुरुं न] एक ज्ञानोपदेष्टा गुरु के समान (पुरुभोजसम्) = खूब ही हमारा पालन करनेवाले हैं। ये प्रभु हमें भी ज्ञानयुक्त बल को देकर सुरक्षित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सदा ज्ञानदीप्ति में निवास करनेवाले व बल के पुञ्ज हैं। उपासक को भी ज्ञानयुक्त बल देकर वे सुरक्षित जीवनवाला बनाते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We pray to Indra, lord of light, omnificent, hallowed with heavenly glory, universally generous like clouds of shower, and we ask for food abounding in strength and nourishment and for hundredfold and thousandfold wealth and prosperity abounding in lands, cows and the graces of literature and culture, and we pray for the gift instantly.