वांछित मन्त्र चुनें
412 बार पढ़ा गया

पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तमश्वि॒ना ब॒र्हिः सी॑दतं सु॒मत् । ता वा॑वृधा॒ना उप॑ सुष्टु॒तिं दि॒वो ग॒न्तं गौ॒रावि॒वेरि॑णम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pibataṁ somam madhumantam aśvinā barhiḥ sīdataṁ sumat | tā vāvṛdhānā upa suṣṭutiṁ divo gantaṁ gaurāv iveriṇam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पिब॑तम् । सोम॑म् । मधु॑ऽमन्तम् । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ब॒र्हिः । सी॒द॒त॒म् । सु॒ऽमत् । ता । व॒वृ॒धा॒नौ । उप॑ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । दि॒वः । ग॒न्तम् । गौ॒रौऽइ॑व । इरि॑णम् ॥ ८.८७.४

412 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:87» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:10» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमपान+प्रभुस्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (मधुमन्तम्) = जीवन को मधुर बनानेवाले (सोमं पिबतम्) = सोम का वीर्यशक्ति का पान करो और (सुमत्) = [शोभनं ] शोभनतया (बर्हिः) = छिन्न वासनाओंवाले हृदय में (सीदतम्) = आसीन होओ। आपने ही वस्तुतः वीर्यरक्षण द्वारा हमारे जीवन को मधुर बनाना है और इसे वासनाशून्य करना है। [२] (वावृधाना) = हमारे जीवनों में वृद्धि को प्राप्त करते हुए (ता) = वे आप दोनों (दिवः) = उस प्रकाशमय प्रभु के (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तवन को इस प्रकार (उपगन्तम्) = समीपता से प्राप्त होओ, (इव) = जैसे (गौरौ) = दो तृषित गौर मृग (इरिणम्) = एक छोटी नदी को प्राप्त होते हैं। नदी को प्राप्त करके ही उन गौर मृगों की तृषा शान्त होती है, इसी प्रकार प्रभुस्तवन ही हमारे प्राणापानों के लिये शान्ति का देनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से सोमरक्षण द्वारा जीवन मधुर बनता है- हृदय वासनाशून्य होता है-प्रभुस्तवन की प्रवृत्ति जागरित होती है।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, come from the light of heaven, sit together on the holy grass, drink the honey sweet soma like thirsty deer in the forest, and, exhilarated, listen to the song of adoration offered in honour of divinity.