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विश्वेत्ता विष्णु॒राभ॑रदुरुक्र॒मस्त्वेषि॑तः । श॒तं म॑हि॒षान्क्षी॑रपा॒कमो॑द॒नं व॑रा॒हमिन्द्र॑ एमु॒षम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvet tā viṣṇur ābharad urukramas tveṣitaḥ | śatam mahiṣān kṣīrapākam odanaṁ varāham indra emuṣam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वा॑ । इत् । ता । विष्णुः॑ । आ । अ॒भ॒र॒त् । उ॒रु॒ऽक्र॒मः । त्वाऽइ॑षितः । श॒तम् । म॒हि॒षान् । क्षी॒र॒ऽपा॒कम् । ओ॒द॒नम् । व॒रा॒हम् । इन्द्रः॑ । ए॒मु॒षम् ॥ ८.७७.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:77» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:30» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:10


शिव शंकर शर्मा

अब राजा की प्रशंसा करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् महाराज ! आप (यम्) जिस बाण को (युजम्) अपने सहायक और प्रयोग में लावें, वह वैसा होवे। (शतब्रध्नः) जिसमें बहुत से अग्रभाग हों और (सहस्रपर्णः) जिसमें सहस्र पंख लगे हों, ऐसा यदि (एकः+इत्) एक ही (तव+इषुः) तेरा बाण हो, तो भी अच्छा ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजा के सर्व आयुध तीक्ष्ण और स्थायी हों ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महषि, क्षीरपाक ओदन, एमुष वराह

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (त्वा इषितः) = तेरे से प्रार्थना किया हुआ तेरे से जाना गया- यह (विष्णुः) = सर्वव्यापक (उरुक्रमः) = महान् पराक्रमवाला प्रभु (विश्वा इत् ता) = सब ही निश्चय से उन ज्ञानों को गतमन्त्र में वर्णित 'च्यौल वर्षिष्ठ' ज्ञानों को आभरत् प्राप्त कराता है । [२] ये प्रभु ही (शतम्) = शतवर्षपर्यन्त (महिषान्) = [मह पूजायाम्] पूजा की भावनाओं को अथवा उत्तम यज्ञों को प्राप्त कराते हैं। (क्षीरपाकम्) = वेदधेनु के दुग्ध में पके (ओदनम्) = ज्ञान के भोजन को प्राप्त कराते हैं। तथा (एमुषम्) = [मुष स्तेये] सब बुराइयों का मोषण करनेवाली (वराहम्) = [ वरं वरं आहन्ति, हन् गतौ प्राप्तौ ] उत्तमताओं को प्राप्त करानेवाली वृत्ति को हमारे अन्दर भरते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रार्थना किये हुए प्रभु ज्ञानों को, पूजा की भावनाओं को, वेदधेनु के दुग्ध में पके ज्ञान के भोजन को तथा बुराइयों को समाप्त करनेवाली उत्तमता की वृत्ति को प्राप्त कराते हैं।

शिव शंकर शर्मा

अथ राजप्रशंसा।

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र=राजन् ! त्वं यमिषुम्। युजं=सहायकम्। चकृषे=करोषि। स ईदृशो भवेत्। शतब्रध्नः=शताग्रः। पुनः=सहस्रपर्णः। ईदृगेक इत्। तवेषुर्भवेदित्यर्थः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, Vishnu, too, lord omniscient and omnipotent, as wished and prayed, brings in all these hundreds of great things, cattle wealth, milky delicacies and rain laden clouds.