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देवता: अग्निः ऋषि: विरुपः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
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यस्याजु॑षन्नम॒स्विन॒: शमी॒मदु॑र्मखस्य वा । तं घेद॒ग्निर्वृ॒धाव॑ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasyājuṣan namasvinaḥ śamīm adurmakhasya vā | taṁ ghed agnir vṛdhāvati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑ । अजु॑षत् । न॒म॒स्विनः॑ । शमी॑म् । अदुः॑ऽमखस्य । वा॒ । तम् । घ॒ । इत् । अ॒ग्निः । वृ॒धा । अ॒व॒ति॒ ॥ ८.७५.१४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:75» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:14


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे जगदाधार ! तू (गविष्टये) गौ आदि पशुओं की प्राप्ति के लिये (कुवित्) बहुत (रयिम्) सम्पत्ति (नः) हम लोगों को (सुसंवेषिषः) दीजिये। हे भगवन् ! तू (उरुकृत्) बहुत करनेवाला है, इसलिये (नः) हम लोगों की सब वस्तु को (उरु) बहुत (कृधि) कर ॥११॥
भावार्थभाषाः - हम मनुष्य गौ आदि पशुओं को पाल कर उसके दुग्ध घृत आदि से यज्ञकर्म करके लोकोपकार करें ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नमोयुक्त+अदुर्मख

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) = जिस (नमस्विनः) = नमनशील (वा) = तथा (अदुर्मखस्य) = अदुष्ट यज्ञोंवाले उपासक के (शमीम्) = शान्तभाव से किये जानेवाले कर्मों को (अजुषत्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करता है, अर्थात् जिस नम्र यज्ञशील पुरुष के शान्तकर्म प्रभु को प्रीणित करते हैं, (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (तम्) = उस उपासक को (धारत्) = निश्चय से (वृधा अवति) = वृद्धि के द्वारा प्रीणित करते हैं । (२) हम कर्मों द्वारा ही प्रभु का प्रीणन कर पाते हैं। ऐसा करने पर प्रभु हमारी वृद्धि का कारण बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम नम्र यज्ञशील बनकर कर्त्तव्यकर्मों में लगे रहें। यही प्रभु के आराधन का मार्ग है। प्रभु हमारा वर्धन करेंगे।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! गविष्टये=गोप्रभृतिपशूनां प्राप्तये। नः=अस्मान्। कुवित्=बहु। रयिम्=सम्पत्तिम्। सु+संवेषिषः=प्रापय। हे भगवन् ! त्वं उरुकृदसि। नः=अस्माकं सर्वं वस्तु। उरु=महत्। कृधि=कुरु ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni loves and joins the yajnic efforts of the man of humility and generous offerings who, also, shuns negative and unproductive social acts. Such a man, indeed, Agni protects, promotes and advances in life.