'श्रुतर्वा बृहन्- आर्क्ष'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (वृत्रहन्तमम्) = वासनाओं के अधिक-से-अधिक विनष्ट करनेवाले प्रभु को आगन्म प्राप्त होते हैं जो प्रभु (ज्येष्ठं) = प्रशस्यतम हैं, (अग्निम्) = हमें आगे ले चलनेवाले हैं तथा (आनवम्) = हमें प्रीणित करनेवाले हैं। [२] उन प्रभु को हम प्राप्त होते हैं, (यस्य) = जिनके (अनीके) = बल में वह (एधते) = वृद्धि को प्राप्त होता है, जो (श्रुतर्वा) = [ श्रुतेन इयर्ति] शास्त्रज्ञान के अनुसार गतिवाला होता है। (बृहन्) = बड़े हृदयवाला होता है-विशाल हृदय । (आर्क्षः) = [ऋष् गतौ ] गतिशील होता है- सदा क्रियाशील । मस्तिष्क में 'श्रुतर्वा', हृदय में 'बृहन्' तथा हाथों में 'आर्क्ष' बनकर हम प्रभु के सच्चे उपासक होते हैं और प्रभु के बल से बलसम्पन्न बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के हम उपासक बनें। प्रभु हमारी वासनाओं को विनष्ट करेंगे हमें प्राणशक्ति प्राप्त कराएँगें और प्रशस्त जीवनवाला बनाएँगे। सच्चा उपासक ' श्रुतर्वा बृहन् व आर्क्ष' होता है।