वांछित मन्त्र चुनें
322 बार पढ़ा गया

यं जना॑सो ह॒विष्म॑न्तो मि॒त्रं न स॒र्पिरा॑सुतिम् । प्र॒शंस॑न्ति॒ प्रश॑स्तिभिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaṁ janāso haviṣmanto mitraṁ na sarpirāsutim | praśaṁsanti praśastibhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । जना॑सः । ह॒विष्म॑न्तः । मि॒त्रम् । न । स॒र्पिःऽआ॑सुतिम् । प्र॒ऽशंस॑न्ति । प्रश॑स्तिऽभिः ॥ ८.७४.२

322 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:74» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:21» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:2


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे राजा अमात्य ! सूर्य्य का कार्य्य देखिये ! (सु) अच्छे प्रकार (विचाकशत्) विशेषरूप से दीप्यमान यह सूर्य्य अन्धकार का निवारण कर रहा है। यहाँ दृष्टान्त देते हैं (इव) जैसे (परशुमान्) उत्तम कुठारधारी पुरुष (वृक्षम्) वृक्ष को काटता है। तद्वत् सूर्य्य भी मानो, तमोवृक्ष को काट रहा है। तद्वत् आप भी प्रजाओं के क्लेशों को दूर कीजिये ॥१७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मित्रं न सर्पिरासुतिम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यं) = जिस (मित्रं न) = मित्र के समान प्रभु को (हविष्मन्तः जनासः) = हविवाले लोग- दानपूर्वक अदन करनेवाले लोग (प्रशस्तिभिः) = प्रशंसन्ति शंसनात्मक स्तुतिवाक्यों से प्रशंसित करते हैं। हवि के द्वारा ही वस्तुतः प्रभुपूजन होता है। [२] वे प्रभु ('सर्पिरासुतिम्') = [सर्पिः आसूयतेऽनेन इति] हमारे जीवनों में सर्पि को आसुत करनेवाले हैं। 'सृप गतौ' से बनकर 'सर्पिः ' शब्द यहाँ ' दीप्त प्रशस्ति गति' का वाचक है। प्रभु अपने उपासक को इस प्रकार दीप्त गतिवाला बनाते हैं, जैसे एक मित्र मित्र को दीप्त गतिवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम हविवाले बनकर प्रभु का शंसन करें। प्रभु हमें मित्र की तरह उत्तम मार्ग से ले चलनेवाले होंगे।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अश्विनौ, दृश्यतां सूर्य्यस्य कार्य्यम्। सु=सुष्ठु। विचाकशत्=विशेषेण दीप्यमानः सूर्य्यः। तमोराशिं निवारयतीति शेषः। उपमया एषोऽर्थो लभ्यते। इव=यथा। परशुमान्=प्रशस्तकुठारवान् पुरुषो वृक्षं छिनत्ति। तद्वदित्यर्थः ॥१७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Adore and exalt Agni whom yajnic people serve as a friend, with havi in hand and oblations of clarified butter, and celebrate with songs of praise.