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अ॒रु॒णप्सु॑रु॒षा अ॑भू॒दक॒र्ज्योति॑ॠ॒ताव॑री । अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मव॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
aruṇapsur uṣā abhūd akar jyotir ṛtāvarī | anti ṣad bhūtu vām avaḥ ||
पद पाठ
अ॒रु॒णऽप्सुः॑ । उ॒षाः । अ॒भू॒त् । अकः॑ । ज्योतिः॑ । ऋ॒तऽव॑री । अन्ति॑ । सत् । भू॒तु॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥ ८.७३.१६
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:73» मन्त्र:16
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:20» मन्त्र:6
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:16
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे राजा+अमात्य ! (वाम्) आप दोनों का (यः+रथः) जो रथ (रजांसि) विविध लोकों में तथा (रोदसी) द्युलोक और पृथिवी के सर्व भागों में (वि+याति) विशेषरूप से जाता आता है, उस परम वेगवान् रथ के द्वारा हमारे निकट आवें ॥१३॥
भावार्थभाषाः - विमान या रथ वैसा बनावे, जिसकी गति तीन लोक में अहत हो ॥१३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अरुणप्सु + ऋत+ज्योति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आपके अनुग्रह से (उषाः) = उषाकाल हमारे लिए (अरुणप्सुः) = तेजोमय रूपवाला (अभूत्) = हो। हम उषा में प्रबुद्ध होकर प्राणसाधना में प्रवृत्त हों और उषा के समान ही दीप्त रूपवाले बनें। हमारे लिए (ऋतावरी) = ऋत का पालन करानेवाली यह उषा (ज्योतिः अकः) = प्रकाश को करती है। उषाकाल में प्राणायाम करने पर जीवन ऋतमय [यज्ञमय] ज्योतिवाला बनता है। [२] हे प्राणापानो! (वाम्) = आपका (अवः) = रक्षण (सत्) = उत्तम है। वह रक्षण (अन्ति भूतु) = हमें समीपता से प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषाकाल में प्रबुद्ध होकर हम प्राणसाधना करके दीप्त रूपवाले, ज्योतिर्मय व ऋतमय जीवनवाले बनें।
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना=अश्विनौ ! वां=युवयोः। यो रथः। रजांसि=विविधान् लोकान्। तथा रोदसी=द्यावापृथिव्यौ च। वियाति=विशेषेण गच्छति। तेन जवीयसा रथेन अस्मानागच्छतम्। अन्ति० ॥१३॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The golden glory of the dawn is risen and brings in the light according to the law divine. Let your blessings and protections ever be closest to us.
