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यं त्वं वि॑प्र मे॒धसा॑ता॒वग्ने॑ हि॒नोषि॒ धना॑य । स तवो॒ती गोषु॒ गन्ता॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yaṁ tvaṁ vipra medhasātāv agne hinoṣi dhanāya | sa tavotī goṣu gantā ||
पद पाठ
यम् । त्वम् । वि॒प्र॒ । मे॒धऽसा॑तौ । अग्ने॑ । हि॒नोषि॑ । धना॑य । सः । तव॑ । ऊ॒ती । गोषु॑ । गन्ता॑ ॥ ८.७१.५
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:11» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:5
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रियजात) हे सर्वप्राणियों के प्रिय सर्वशक्ते जगदीश ! (वः) तेरे ऊपर (पौरुषेयः+मन्युः) मनुष्यसम्बन्धी क्रोध (नहि+ईशे) अपना प्रभाव नहीं डाल सकता, क्योंकि (त्वम्+इत्) तू ही (क्षपावान्+असि) पृथिवीश्वर है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिस कारण परमात्मा ही पृथिवीश्वर है, अतः उसके ऊपर मनुष्य का प्रभाव नहीं पड़ सकता, किन्तु उसका प्रभाव मनुष्यों के ऊपर पड़ता है, क्योंकि वह क्षपावान्=पृथिवीश्वर है। कोई इस शब्द का अर्थ रात्रिस्वामी भी करते हैं। क्षपा=रात्रि ॥२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गोषु गन्ता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (विप्र) = विशेषरूप से हमारा पूरण करनेवाले (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (यं) = जिस भी व्यक्ति को (त्वं) = आप (मेधसातौ) = यज्ञों की प्राप्ति के निमित्त धनाय हिनोषि = धन के लिए प्रेरित करते हैं । सः = वह तव ऊती आपके रक्षणों के द्वारा गोषु गन्ता - ज्ञान की वाणियों में गतिवाला होता है। [२] हम प्रभु की उपासना करते हैं तो प्रभु हमें यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त करते हैं। उन यज्ञादि के लिए आवश्यक धनों को भी प्राप्त कराते हैं। यह उपासक धनों का यज्ञों में विनियोग करता हुआ विषयों में नहीं फंसता और उत्कृष्ट ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उपासक को यज्ञों के लिए धनों की कमी नहीं होने देते। प्रभु से रक्षित हुआ- हुआ यह व्यक्ति ज्ञान की वाणियों की ओर चलता है।
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे सर्वशक्ते ! हे प्रियजात=जातानां प्राणिनां प्रिय ! वस्तवोपरि। पौरुषेयः। मन्युः=पुरुषसम्बन्धी क्रोधः। नहि+ ईशे। यतस्त्वमिदसि=त्वमेवासि। क्षपावान्=क्षमावान्= पृथिवीश्वरः ॥२॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O vibrant power of wealth, honour and excellence, the man whom you inspire and exhort to win wealth and to dedicate himself to the service of divinities goes forward in the acquisition of lands, cows, and the light of knowledge and culture under your protection.
