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देवता: इन्द्र: ऋषि: पुरुहन्मा छन्द: बृहती स्वर: मध्यमः
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अ॒न्यव्र॑त॒ममा॑नुष॒मय॑ज्वान॒मदे॑वयुम् । अव॒ स्वः सखा॑ दुधुवीत॒ पर्व॑तः सु॒घ्नाय॒ दस्युं॒ पर्व॑तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anyavratam amānuṣam ayajvānam adevayum | ava svaḥ sakhā dudhuvīta parvataḥ sughnāya dasyum parvataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒न्यऽव्र॑तम् । अमा॑नुषम् । अय॑ज्वानम् । अदे॑वऽयुम् । अव॑ । स्वः । सखा॑ । दु॒धु॒वी॒त॒ । पर्व॑तः । सु॒ऽघ्नाय॑ । दस्यु॑म् । पर्व॑तः ॥ ८.७०.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:70» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:11


शिव शंकर शर्मा

पुनः उस अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वः) आप सब मिल कर (महः) तेजःस्वरूप (महाय्यम्) परमपूज्य और (दानाय) जीवों को कर्मानुसार फल देने के लिये सर्वत्र (सक्षणिम्) विद्यमान (तम्+इन्द्रम्) उस परमात्मा को गाओ और पूजो (गाधेषु) गाध और अगाध जल में और (यः) जो (आरणेषु) स्थलों में (हव्यः) स्तवनीय और प्रार्थनीय होता है और जो (वाजेषु) वीरों के वीर कर्मों में (हव्यः+अस्ति) प्रार्थनीय होता है, जिसको लोग सर्वत्र बुलाते हैं, वह परम पूज्य है ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! वह ईश्वर जीवों को प्रतिक्षण दान दे रहा है। सुख, दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति, नदी, समुद्र, अरण्य, जल और स्थल सर्वत्र और सब काल में उसकी उपासना करो ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अन्यव्रत- अमानुष - अयज्वा अदेवयु' का स्वर्गभ्रंश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (सखा) = यज्ञशील पुरुषों का मित्र (पर्वतः) = हमारा पूरण करनेवाला प्रभु (अन्यव्रतम्) = वेदोपदिष्ट कर्मों से भिन्न कर्मों को करनेवाले को, (अमानुषम्) = निर्दय को (अयज्वानम्) = अयज्ञशील को (अदेवयुम्) = दिव्यगुणों को प्राप्त करने की कामना न करनेवाले का (स्वः) = स्वर्ग से (अवदुधुवीत) = कम्पित करके दूर कर देता है। 'अन्यव्रत, अमानुष, अयज्वा, अदेवयु' को सुख प्राप्त नहीं होता । [२] (पर्वतः) = वह पूरण करनेवाला प्रभु (दस्युं) = उपक्षय करनेवाले को (सुघ्नाय) = सम्यक् हनन के लिए प्रेरित कर इस दस्यु का आप विनाश करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु 'अन्यव्रत, अमानुष, अयज्वा, अदेवयु' पुरुष को सुखों से पृथक् करते हैं। दस्यु का प्रभु विनाश करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वः यूयम्। प्रथमार्थे द्वितीया। महः=तेजःस्वरूपम्। महाय्यं=परमपूज्यम्। दानाय=जीवेभ्यः कर्मानुसारेण फलदातुम्। सर्वत्र। सक्षणिम्=विद्यमानं तमिन्द्रं गायत। यश्चेन्द्रः। गाधेषु=जलेषु। यः। आरणेषु=स्थलेषु च। हव्यः=स्तुत्यः। यश्च। वाजेषु=वीराणां वीरकार्य्येषु। हव्योऽस्ति ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Friendly, generous but adamantine ruler, punish the person committed to destructive values, anti-human organisation, anticreative and antisocial actions and antinature and impious plans and programmes, punish him with deprivation of comfort, self-satisfaction and social privileges and assign him to sure elimination or total change. The strong uncompromising ruler should punish the violent, the terrorist and the killer to an equal and opposite fate.