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सु॒रथाँ॑ आतिथि॒ग्वे स्व॑भी॒शूँरा॒र्क्षे । आ॒श्व॒मे॒धे सु॒पेश॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

surathām̐ ātithigve svabhīśūm̐r ārkṣe | āśvamedhe supeśasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सु॒ऽरथा॑न् । आ॒ति॒थि॒ऽग्वे । सु॒ऽअ॒भी॒शून् । आ॒र्क्षे । आ॒श्व॒ऽमे॒धे । सु॒ऽपेश॑सः ॥ ८.६८.१६

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:68» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:4» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:16


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हम उपासकगण (देववीतिम्) शुभकर्म को (मनामहे) समझते हैं कि यह (नृभ्यः+उरुम्) मनुष्य के लिये बहु विस्तृत शुभ (पन्थाम्) मार्ग है, (गवे+उरुम्) गौ अश्वादि पशुओं के लिये भी यह हितकारी है तथा (रथाय+उरुम्+पन्थाम्) रथों के लिये भी सुखकारी है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों का शुभ यज्ञादि कर्म केवल अपने ही लिये नहीं, किन्तु जड़ और चेतन दोनों का कल्याणकारी है ॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुरथ-स्वभीशु-सुपेशस्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आतिथिग्वे) = अतिथिग्व-उस महान् अतिथि प्रभु के प्रति गतिवाले के सन्तान, अर्थात् अतिशयेन प्रभु की ओर जानेवाले, प्रभु से रक्षित 'इन्द्रोत' में होनेवाले (सुरथान्) = शोभन शरीररथवाले इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करता हूँ। [२] (आर्क्षे) = ऋक्षपुत्र में - अतिशयेन गतिशील व्यक्ति में होनेवाले (स्वभीशून्) = उत्तम मनरूप लगामवाले इन्द्रियाश्वों को मैं प्राप्त करता हूँ। [३] (आश्वमेधे) = सर्वव्यापक प्रभु से मेलवाले पुरुष में होनेवाले (सुपेशसः) = उत्तम आकृतिवाले इन्द्रियाश्वों को मैं प्राप्त करता हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे इन्द्रियाश्व उत्तम शरीररूप रथवाले उत्तम मनरूप लगामवाले व उत्तम आकृति के हों।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - नृभ्यः=मनुष्येभ्यः। उरुं=बहुलाभकरम्। गवे= गवादिपशुभ्यः। उरुं=हितकरम्। रथाय। उरुम्। पन्थाम्। देववीतिम्। देवयज्ञम्। मनामहे=मन्यामहे ॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the body in service of the visiting resident soul, I get another two fast and controlled organs in fine shape for the systemic and yajnic working of the body system.