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उ॒भयं॑ शृ॒णव॑च्च न॒ इन्द्रो॑ अ॒र्वागि॒दं वच॑: । स॒त्राच्या॑ म॒घवा॒ सोम॑पीतये धि॒या शवि॑ष्ठ॒ आ ग॑मत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ubhayaṁ śṛṇavac ca na indro arvāg idaṁ vacaḥ | satrācyā maghavā somapītaye dhiyā śaviṣṭha ā gamat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒भय॑म् । शृ॒णव॑त् । च॒ । नः॒ । इन्द्रः॑ । अ॒र्वाक् । इ॒दम् । वचः॑ । स॒त्राच्या॑ । म॒घऽवा॑ । सोम॑ऽपीतये । धि॒या । शवि॑ष्ठः । आ । ग॒म॒त् ॥ ८.६१.१

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:61» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:36» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:1


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वाधार ईश ! (तुभ्यम्) तुझको ही (केतेन) ज्ञापक प्रदर्शक (चिकित्वना) विज्ञान द्वारा मनुष्यगण पूजते हैं। जो तू सदा (सु+सामनि) सुन्दर सामगानों से युक्त (शर्मन्) मङ्गलमय यज्ञादि स्थान में (सचते) निवास करता है, वह तू (इषण्यया) स्वकीय इच्छा से (ऊतये) हम लोगों की रक्षा और साहाय्य के लिये (पुरुरूपम्) नानाविध (नेदिष्ठम्) और सदा समीप में रहनेवाले (वाजम्) ज्ञान, विज्ञान और अन्नादिक पदार्थ (नः) हम उपासकों को (आ+भर) दे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जहाँ तुम निवास करो, वहाँ पवित्र बना रक्खो। वहाँ सर्वदा ईश्वर की स्तुति प्रार्थना के लिये पवित्र स्थान बनाओ और उसी की आज्ञा पर सदा चला करो, तब ही तुम्हारा कल्याण होगा ॥१८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूक्ष्मार्थग्राहिणी बुद्धि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्र:) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (नः) = हमारे लिए (उभयं इदं वचः) = प्रकृति व आत्मा दोनों के ज्ञान के देनेवाले इस वेदवचन को (अर्वाक्) = अन्तर्हृदय में [हमारे अभिमुख] (शृणवत्) = [अन्तर्भावित ण्यर्थ ] सुनाएँ । हृदयस्थ प्रभु से हम उन ज्ञान की वाणियों को सुन पाएँ जो प्रकृति व आत्मा का ज्ञान देनेवाली हैं। [२] वह (शविष्ठः) = अतिशयेन शक्तिशाली (मघवा) = ज्ञानरूप ऐश्वर्यवाले प्रभु (सत्राच्या) = सत्यज्ञान के साथ गतिवाली - सत्यज्ञान को प्राप्त करानेवाली (धिया) = बुद्धि के साथ (आगमत्) = हमें प्राप्त हों। ये प्रभु (सोमपीतये) = सोम के रक्षण के लिए हों। सोमरक्षण द्वारा ही वे हमें उस सूक्ष्मार्थग्राहिणी बुद्धि को प्राप्त कराएँगे जो प्रकृति व आत्मा के तत्त्व को समझने के योग्य हमें बनाएगी ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें प्रकृति व आत्मा के ज्ञान को देनेवाले वेदवचनों को सुनाएँ । सोमरक्षण द्वारा उस बुद्धि को प्राप्त कराएँ जो सूक्ष्म अर्थों के सत्यतत्त्व को जानने में समर्थ हो ।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने=सर्वाधार ! सुसामनि=शोभनगानोपेते। यस्मिन् शर्मन्=शर्मणि=कल्याणविधायके यज्ञे। सचते=निवसते। तुभ्यम्। केतेन=प्रज्ञापकेन। चिकित्वना=विज्ञानेन। यजते इति शेषः। स त्वम्। इषण्यया=स्वकीयया इच्छया। नोऽस्मभ्यम्। पुरुरूपं=नानाविधम्। नेदिष्ठं=सर्वदा समीपे वर्तमानम्। वाजम्=विज्ञानम्। अन्नादिकञ्च। ऊतये=रक्षायै। आभर=आहर=आनय ॥१८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Indra, lord omnipotent, master of the world’s wealth and power, directly listen to our joint prayer for worldly and spiritual advancement with attentive ear and sympathetic understanding, and may the lord of supreme power come to protect and promote our yajnic programme and prayer and taste the pleasure of success.